उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) और उसके इंजीनियरों को करारा झटका देते हुए विभाग में वर्षों से ठेके पर कार्यरत श्रमिकों को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने चार अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर उन्हें खारिज कर दिया। इसके साथ ही दिल्ली स्थित औद्योगिक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के फैसले को बरकरार रखा गया, जिसमें श्रमिकों को 20 प्रतिशत बकाया वेतन और पुनः नियुक्ति पर विचार करने का आदेश दिया गया था।
ठेका प्रथा से श्रमिकों के अधिकार नहीं छीने जा सकते
नैनीताल हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि श्रमिकों को 20 प्रतिशत बकाया वेतन दिया जाए और उनकी पुनः नियुक्ति पर सरकार नीति अनुसार विचार करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि ठेका प्रथा के सहारे श्रमिकों के अधिकार नहीं छीने जा सकते।
कोर्ट ने ठेकेदारी प्रथा को बताया दिखावा
श्रमिकों की ओर से तर्क दिया गया कि उनका काम विभाग के अफसरों की सीधी देखरेख में होता था, जिससे साफ है कि वे असल में विभाग के कर्मचारी थे। कोर्ट ने भी इस दलील को सही माना और कहा कि जब काम नियमित और स्थायी प्रकृति का हो तथा श्रमिक सीधे विभागीय अफसरों की निगरानी में कार्यरत हों तो ठेका प्रणाली महज दिखावा मानी जाएगी।
कोर्ट ने इसे शोषण और अनुचित श्रम व्यवहार माना
कोर्ट ने टिप्पणी की कि श्रमिकों को हटाने का कदम शोषण और अनुचित श्रम व्यवहार है। साथ ही यह भी उल्लेख किया कि न्यूनतम वेतन की मांग उठाने के तुरंत बाद दूसरी बार सेवा समाप्त करना विभाग की मंशा पर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक लगातार काम करने वाले श्रमिकों को केवल ठेके का हवाला देकर रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन हजारों ठेका कर्मचारियों के लिए राहत का संदेश है, जो वर्षों से सरकारी विभागों में लगातार सेवा देने के बावजूद असुरक्षा में जी रहे हैं।







