नूंह जिले का सामाजिक ताना-बाना बच्चों और उनकी शिक्षा पर हावी है। जिस उम्र में बच्चे खेल-खेल में बुनियादी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, वहीं यहां का बचपन मजहबी तालीम में पिसकर रह गया है। उनकी शिक्षा अरबी-उर्दू और मजहबी तालीम तक सिमट कर रह गई है। इस हकीकत से हरियाणा सरकार और प्रशासन भी वाकिफ है। स्कूलों में पंजीकृत आधे बच्चे मिड-डे मील के लिए दस बजे के बाद स्कूल पहुंचते हैं और खाना खाकर निकल जाते हैं। शिक्षक चाहकर भी नहीं रोक पाते हैं क्योंकि अभिभावकों और पंचायतों की सख्त हिदायत है कि बच्चों को मदरसे की तालीम से नहीं रोकें। लिहाजा इसके लिए स्कूल और जिला प्रशासन भी अपनी मौन स्वीकृति दे चुके हैं।
1925 में सबसे पहले हजरत मौलाना मरहूम इलियास ने तब्लीगी जमात की शुरुआत यहीं से की थी। यहीं पर पहला और सबसे बड़ा पहला मोइनुल इस्लाम नामक मदरसा साल 1922 में बना था। दुनियाभर में तब्लीगी जमात और इस्लाम के प्रचार की शुरुआत यहीं से हुई थी। इसी कारण इस्लाम में नूंह की धरती को पाक माना जाता है। आज भी यहां औपचारिक शिक्षा के बजाय मजहबी शिक्षा को तवज्जो दी जाती है। सबसे बड़े मदरसे की सालाना आय लाखों रुपये में है और इसकी अपनी दुकानें और जमीन भी हैं। अन्य मदरसे चंदे और कुछ बेटियों की टयूशन फीस से चलते हैं।
अरावली की तलहटी से सटे घाघस गांव स्थित मकतब के मौलवी अकरम कहते हैं कि वह कोचिंग सेंटर की तरह यहां इस्लामी तालीम देते हैं। यहां करीब 85 लड़कियां हैं। उनके अभिभावकों से 200 से 450 रुपये तक फीस ली जाती है। साढ़े पांच साल की हिजाब पहनी अलमा को सिर्फ धार्मिक शिक्षा पाने की आजादी है। स्कूल क्या होता है, उसे नहीं पता। तिलसामा कहती हैं कि वह पांचवीं तक इंग्लिश मीडियम के बाद स्कूल नहीं गई। घरवाले स्कूल भेजने के बजाय धार्मिक किताबें पढ़ाते हैं। जारा अरावली पब्लिक स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ती है, लेकिन मदरसे में कुरान पढ़ना अनिवार्य है। नहीं तो स्कूल जाने नहीं दिया जाएगा। अभिभावक स्कूल में फ्री शिक्षा नहीं दिलाना चाहते लेकिन मजहबी तालीम के लिए पैसे देने को तैयार हैं। मोहम्मद शोहेब (19) मालम आवासीय मदरसे में पांच साल में पढ़ रहे हैं। यहां से निकलने के बाद मदरसा ही खोलना चाहते हैं। मदरसे के 150 छात्रों में से किसी को बुनियादी शिक्षा का ज्ञान नहीं है।
रोजगार से जोड़ने पर भी कोई काम नहीं
स्कूलों में किताबी ज्ञान के साथ रोजगार के प्रति भी जागरूक किया जाता है। दसवीं के बाद उन्हें रोजगार के लिए आईटीआई से ऑटो, एसी मैकेनिक, वेल्डिंग, कारपेंटर समेत अन्य काम का प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन मदरसों में तालीम पाने वाले छात्रों को दसवीं तक का ज्ञान भी नहीं होता है। 17 साल के बाद जब वे मदरसे से निकलते हैं तो उन्हें सिर्फ धार्मिक, उर्दू या अरबी का ही ज्ञान होता है।
हरियाणा सरकार ने अभी मदरसों और उनकी पढ़ाई को मान्यता नहीं दी है। इसलिए वहां पढ़ने वाले बच्चों की कोई भी शिक्षा मान्य नहीं होगी। प्रशासन पंचायतों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अक्सर लोगों को अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा से जोड़ने की मांग करता है। उन्हें जागरूक किया जाता है, लेकिन अभिभावक मदरसों में भेजने पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
-अखिल पिलानी, उपायुक्त, नूंह






