देश में 20 से 29 साल के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं। चिंता की बात यह है कि बेरोजगार के रूप में पंजीकरण कराने के एक वर्ष के भीतर सिर्फ सात फीसदी स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। हाल के वर्षों में स्नातकों की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और बढ़ गई है।
पुरुषों की नामांकन दर में गिरावट
पिछले चार दशक में उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 फीसदी तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है। हालांकि, पुरुषों के नामांकन में गिरावट आई है। यह 2017 के 38 फीसदी से घटकर 2024 के अंत तक 34 फीसदी रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए कमाने के मौके तलाशने लगते हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है। प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढ़कर 2021 में 45 पहुंच गईं, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है।
गरीब परिवारों की उच्च शिक्षा में बढ़ी भागीदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ फीसदी से बढ़कर 2017 में 15 फीसदी हो गई है। लेकिन, आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं। महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों मसलन इंजीनियरिंग और मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक है। युवा तेजी से कृषि से हटकर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 फीसदी की वृद्धि हुई है। साथ ही, निजी संस्थानों में गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं।








