सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्ज वसूली जैसे व्यावसायिक विवाद को जातिगत अत्याचार का रंग नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि जाति के आधार पर अपमान का ठोस आरोप होना आवश्यक है।
एसबीआई ने एक कंपनी को कर्ज दिया था। 2016 में कंपनी के खाते गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) हो गए थे। कंपनी के निदेशक वाई राजशेखर ने बैंक अधिकारियों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया। उन्होंने फर्जी दस्तावेज बनाने और गलत जानकारी देने की बात कही थी। पुनरुद्धार पैकेज देने से इन्कार करने का आरोप भी लगाया गया था।
बैंक अधिकारियों की याचिका पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इन्कार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले से असहमति जताई। कोर्ट ने कहा, मूल रूप से यह कर्ज वसूली विवाद है। कोर्ट ने कहा, यह जातिगत भेदभाव का मामला नहीं है। पीठ ने केस रद्द करते हुए कहा, अधिकारियों पर निदेशकों का जाति के आधार पर अपमान करने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं है।
शिकायत में विरोधाभास
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत में विरोधाभासों को नोट किया। कंपनी को एससी-एसटी महिलाओं की ओर से प्रबंधित बताया गया था, जबकि कंपनी की एमडी महिला नहीं है। कोर्ट ने कहा, सिर्फ इसलिए कि कंपनी के निदेशक एससी/एसटी से हैं, पुनर्वास पैकेज न देना आपराधिक मुकदमा चलाने का कारण नहीं बन सकता।






