आज भारत छोड़ो आंदोलन के 83 साल पूरे हो गए हैं। इस आंदोलन में पुरुषो के साथ महिलाओं का भी अहम योगदान था। आइए जानते है कि ”भारत छोड़ो आंदोलन” में आखिर किन -किन महिलाओं ने भाग लिया था।
भारत छोड़ो आंदोलन क्या है?
अंग्रेजो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए भारत ने कई आंदोलन किए। इनमें से ही एक “भारत छोड़ो आंदोलन” है। इसे “अगस्त क्रांति” और ”क्विट इंडिया मूवमेंट” के नाम से भी जाना जाता है। भारत छोड़ो आंदोलन को भारत की स्वतंत्रता के लिए अखिरी आंदोलन माना जाता है। इस आंदोलन की शुरुआत नौ अगस्त 1942 को हुई थी। इसका नेतृत्व गांधी जी ने किया था। इस लड़ाई में गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई थी। इस मैदान को आज अगस्त क्रांति मैदान नाम से जाना जाता है।
भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?
इसके पीछे का इतिहास है कि चार जुलाई 1942 के दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभुमि के बारे में बात करे तो भारत का यह मांग थी कि ब्रिटेन घोषणा करे कि भारत अहिंसक तरीके से युद्ध के विरूद्ध प्रचार प्रसार करने के लिए स्वतन्त्र है। इसके साथ ही युद्ध के खिलाफ असहयोग आन्दोलन होगा, लेकिन सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन नहीं होगा। यदि यह मांग अस्वीकार हुई तो कांग्रेस के समक्ष ठोस कदम उठाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। गांधी जी की दलील यह थी कि ब्रिटेन में भी युद्ध विरोधी लोगों को जबरन सेना में भर्ती नहीं किया जाता है, और उन्हें अपनी बात खुलकर कहने की आजादी भी प्राप्त थी।
आंदोलन का असर क्या हुआ?
आंदोलन का एलान होने के साथ ही ब्रिटिश सरकार सक्रिय हो गई। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। देशभर में कांग्रेस कार्यालयों पर छापे मारे गए। अंग्रेजों ने गांधीजी को कैद करके इन आंदोलन को दबाने की कोशिश की। पार्टी की कार्यसमिति के सभी सदस्यों को भी जेल में डाल दिया गया। अंग्रेज ने कांग्रेस पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इन कार्रवाइयों से अंग्रेज भले ही आंदोलन को दबाना चाह रहे थे लेकिन इसने देश में लोगों के बीच आंदोलन के प्रति सहानुभूति पैदा की। प्रत्यक्ष नेतृत्व की कमी के बावजूद, पूरे देश में बड़े विरोध और प्रदर्शन हुए। सरकारी कर्मचारियों के बड़े समूहों ने हड़तालें बुलाईं।
एक लाख से अधिक गिरफ्तारियां की गईं, बड़े पैमाने पर जुर्माना लगाया गया और प्रदर्शनकारियों को सरेराह कोड़े मारे गए। हिंसा में सैकड़ों नागरिक मारे गए। कई राष्ट्रीय नेता भूमिगत हो गए और गुप्त रेडियो स्टेशनों पर संदेश प्रसारित करके, पर्चे बांटकर और समानांतर सरकारें स्थापित करके अपना संघर्ष जारी रखा।
कांग्रेस नेतृत्व ने तीन वर्षों से अधिक समय जेल में काटा। कुछ ही महीनों में महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी और उनके निजी सचिव महादेव देसाई की मृत्यु हो गई और उनका स्वास्थ्य खराब हो रहा था। इसके बावजूद महात्मा गांधी ने 21 दिन का उपवास रखा और निरंतर प्रतिरोध के अपने संकल्प को बनाए रखा। 1944 में अंग्रेजों ने गांधीजी को उनके स्वास्थ्य के कारण रिहा कर दिया, लेकिन उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व की रिहाई की मांग करते हुए प्रतिरोध जारी रखा।
1945 में, जब द्वितीय विश्व युद्ध लगभग समाप्त हो गया था, ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के वादे के साथ चुनाव जीता। आखिरकार आंदोलन से सहमी ब्रिटिश हुकूमत ने जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को 1945 में रिहा कर दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भाग भी ली थी। इस आंदोलन में खासकर स्कूल और कॉलेज की छात्रों ने अहम योगदान दिया था। अगस्त क्रांति में अरुणा आसफ अली और सुचेता कृपलानी प्रमुख महिला आयोजक थीं।
अरुणा असफ अली
अनंतन वी. कुरुप अपने रिसर्च में लिखा है कि अरुणा आसफ अली हरियाणा की रहने वाली थी।1928 में शादी के बाद वह कांग्रेस की सक्रिया सदस्य बन गई थी। पहली बार वह 1930 के नमक सत्याग्रह में किसी राजनीतिक आंदोलन में शामिल हुई थीं। हालांकि उन्हें आंदोलन में शामिल होने के लिए एक साल की लंबी कैद की सजा सुनाई गई थी। अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बॉम्बे प्रस्ताव के बाद पुलिस की बर्बरता के बीच ग्वालियर टैंक पर तिरंगा फहराया था। इस के कारण पुलिस ने उन्हें अपराधी घोषित कर दिया था और उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई थी। अरुणा ने भारत छोड़ो आंदोलन के बाद 1946 के रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह में शामिल थीं। इसके साथ ही आजादी के बाद वह राजनीति में आईं और 1958 में दिल्ली की मेयर नियुक्त हुईं।
मातंगिनी हाजरा
मातंगिनी हाजरा ने 1942 के राष्ट्रवादी संघर्ष में ग्रामीण लोगों की भागीदारी का आदर्श उदाहरण थीं। मातंगिनी का जन्म पश्चिम बंगाल में हुआ था।वह गांधीजी की विचारधाराओं और शिक्षाओं से प्रेरित थीं। उन्हें अक्सर “गांधी बुढ़ी” कहा जाता था। हाजरा ने 1942 में 73 वर्ष की उम्र में 6000 लोगों के एक जुलूस का नेतृत्व किया था, जिनमें ज्यादातर महिलाएं शामिल थीं। इस जुलूस ने एक स्थानीय पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ की थी। हालांकि पुलिस ने बाद में गोलीबारी शुरू कर दी। इस तरह उनकी जान चली गई।
सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी, जिन्हें हम भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में जानते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सबसे सक्रिय भागीदारी भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। भारत छोड़ो संघर्ष की शुरुआत से बहुत पहले ही, उन्होंने 1940 में महिलाओं में राजनीतिक चेतना बढ़ाने के उद्देश्य से कांग्रेस के महिला विभाग की स्थापना कर दी थी। भारत छोड़ों आंदलोन के दौरान, जब उन्हें बॉम्बे प्रस्ताव के बाद कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी का पता चला, तो उन्हें भाग लेने वाले समूहों के बीच प्रयासों के समन्वय का काम सौंपा गया। सुचेता कृपलानी ने अधिकारियों की नजरों से बच कर अलग- अलग नेताओं के बीच संदेश लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा की।
उषा मेहता
शंभू दयाल पीजी कॉलेज के सह- प्राध्यापक अनिल चौहान ने अपने रिसर्च पेपर में लिखा है कि उषा मेहता का जन्म गुजरात में हुआ था और उनका बचपन भी गुजरात में ही बीता। उनके पिता, जो ब्रिटिश राज में न्यायाधीश थे, की सेवानिवृत्ति के बाद, वे बंबई (मुंबई) में आकर बस गए। बचपन से ही, उषा मेहता गांधीजी और उनके सादगी भरे जीवन से बहुत प्रेरित थीं। वह हमेशा अपनी मातृभूमि भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाने के लिए कुछ करना चाहती थीं। 1942 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद, भारत छोड़ो आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया। इस शून्य को भरने और इस अवसर पर खड़े होने के लिए, उषा मेहता जैसे नए नेता अहय भूमिका में आए। उषा मेहता ने बंबई से प्रसारित होने वाला एक कांग्रेस रेडियो स्टेशन शुरू किया। इस रेडियो स्टेशन के माध्यम से जेल में बंद प्रमुख कांग्रेस नेताओं के संदेश भारत की जनता के बीच प्रसारित किए जाते थे। लेकिन इसके तुरंत बाद, उषा मेहता और अन्य लोगों को अंग्रेजों ने पकड़ लिया। उन्हेम लगभग चार साल की जेल की सजा सुनाई। 1946 में रिहा होने के बाद भी, उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए अन्य काम में शामिल हो गई।







