भवानीपुर में सूरमाओं का समर, ममता की केमेस्ट्री पड़ेगी भारी या शुभेंदु का अंकगणित करेगा खेला

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कालीघाट की उन तंग गलियों में मां भवानी के जयकारों के बीच धूप-अगरबत्ती की महक तैर रही है। ठीक उसी के सामने मामूली सा खपरैल वाला घर है। यह घर बंगाल की सत्ता का वह केंद्र है, जिसकी सादगी के किस्से कभी मिसाल हुआ करते थे। लेकिन, आज भवानीपुर की इन गलियों में सादगी के ऊपर सियासत का शोर भारी है। यह शोर है… ममता बनर्जी की केमेस्ट्री बनाम शुभेंदु अधिकारी का अंकगणित।

 

साल 2011 में जब ममता पहली बार सत्ता के शिखर पर बैठी थीं, तब उनकी कुल जमा पूंजी एक सूती साड़ी और दुर्गा सप्तशती का पाठ भर थी। आज भी वह वहीं रहती हैं, लेकिन अब इस सादगी के किले के चारों ओर विरोधाभासों की दीवारें खड़ी हो गई हैं। चर्चा ममता बुआ के पुराने घर की भी है और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की डायमंड हार्बर वाली उस बड़ी छावनीनुमा हवेली की भी। यह हवेली अब विपक्ष के लिए भ्रष्टाचार के आरोपों का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

ममता और भवानीपुर का रिश्ता महज विधायक और क्षेत्र का नहीं है। यह सीट ममता को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने वाला लांचिंग पैड और फिर उनका सबसे मजबूत गढ़ रही है। वह यहां से दो बार, साल 2011 के उपचुनाव और फिर 2016 के आम चुनाव में विधायक रह चुकी हैं। 2021 में उन्होंने उपचुनाव जीतकर तीसरी बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। वह दक्षिण कोलकाता लोकसभा सीट, जिसमें भवानीपुर विधानसभा आती है, वहां से छह बार सांसद रह चुकी हैं। यानी, इस मिट्टी के कण-कण से उनका पुराना नाता है।

लोगों से जुड़ाव ममता की ताकत, शुभेंदु ठोस गणित के साथ मैदान में
ममता की ताकत उनका लोगों से जुड़ाव है, लेकिन शुभेंदु ठोस गणित के साथ मैदान में हैं। साल 2021 के उपचुनाव में ममता ने यहां 58,832 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल की बढ़त सिमटकर महज 3,492 वोट रह गई। इसके बाद मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में यहां 60 हजार से अधिक वोट काट दिए गए।

कुल मतदाता संख्या 2,05,553 से घटकर अब केवल 1,60,313 रह गई है। ममता ने इस पर गहरी नाराजगी जताते हुए इसे साजिश बताया है और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। वहीं, शुभेंदु इसी अंकगणित के दम पर ममता को 20 हजार वोटों से हराने की हुंकार भर रहे हैं।

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नंदीग्राम की तर्ज पर भाजपा ने की घेराबंदी
साल 2021 में ममता नंदीग्राम जाकर शुभेंदु अधिकारी को उनके घर में चुनौती देने पहुंची थीं। इस बार भाजपा ने वही रणनीति उलट दी है। शुभेंदु अधिकारी खुद भवानीपुर के मैदान में उतरकर सीधे मुकाबले को धार दे रहे हैं। शुभेंदु का प्रचार आक्रामक और निरंतर है। वह सुबह से देर शाम तक छोटे-छोटे समूहों में संवाद कर रहे हैं। उनका विशेष जोर भद्रलोक और कारोबारी वर्ग तक अपनी पैठ बनाने पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस इलाके में मौजूदगी ने भी भाजपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।

भद्रलोक की हलचल और खामोश संकेत…भवानीपुर और आसपास के इलाकों में रहने वाले व्यापारिक और संभ्रांत वर्ग में इस बार हलचल कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है। एक स्थानीय कारोबारी का कहना है कि लंबे समय बाद बदलाव की बात हो रही है और लोग अब विकल्प पर गंभीरता से सोच रहे हैं। वहीं, एक अन्य व्यक्ति के अनुसार, रोजगार और ठप पड़े उद्योग इस समय सबसे बड़े मुद्दे हैं। लोग चाहते हैं कि अब स्थिति में सुधार हो। हालांकि, यह संभ्रांत वर्ग अब भी खुलकर बोलने से बच रहा है, लेकिन उनके संकेत साफ हैं।

ममता रात में कर रहीं संवाद
ममता का अंदाज बिल्कुल अलग है। बड़े मंचों के बजाय वह रात के समय गलियों में निकलकर सीधे लोगों से संवाद कर रही हैं। वह वोट मांगने से ज्यादा यह भरोसा जताती दिखती हैं कि सरकार फिर उन्हीं की लौटेगी। इसमें भद्रलोक के लिए सूक्ष्म चेतावनी भी छिपी है कि सत्ता में वापसी तृणमूल की ही होगी, इसलिए सोच-समझकर फैसला लें। इन पॉश इलाकों में अक्सर लोग वोट डालने कम निकलते हैं, ऐसे में…हम फिर आ रहे हैं…का संदेश देकर ममता मतदाताओं के मनोविज्ञान से खेल रही हैं।

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फुलक्रीम दूध बनाम स्किम्ड : वरिष्ठ पत्रकार शंखदीप दास का विश्लेषण इस बार बहुत दिलचस्प है। कहते हैं कि 60 हजार से ज्यादा वोटों का कटना कोई मामूली बात नहीं है। भाजपा का कोर वोटर आज भी फुलक्रीम दूध की तरह अपनी जगह जमा हुआ है, जबकि तृणमूल का जनाधार इस सीट पर स्किम्ड मिल्क यानी मलाई निकले दूध की तरह पतला नजर आ रहा है।

केमेस्ट्री जीतेगी या गणित : भवानीपुर की लड़ाई अब एक बड़े सवाल पर आकर टिक गई है। क्या ममता की जमीन से जुड़ी पकड़ और लोगों का भरोसा इन बदले हुए आंकड़ों के दबाव को फिर से पीछे छोड़ पाएगा? या फिर घटे हुए मतदाता और सिमटी हुई बढ़त का गणित इस बार बंगाल की राजनीति की कहानी बदल देगा? फिलहाल स्थिति यह है कि एकतरफा मानी जाने वाली यह सीट अब देश की हाईप्रोफाइल जंग बन चुकी है। कालीघाट की मां भवानी इस बार किसे अपना विजय तिलक लगाती हैं, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।


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