Himachal- हिमाचल HC ने रद्द किया सरकारी कर्मचारी भर्ती सेवा शर्तें अधिनियम, अनुबंध सेवा लाभ बहाल

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हजारों कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम 2024 को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकार के पिछले 50 वर्षों के शोषणकारी इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार बार-बार कानून बदलकर अदालती आदेशों को निष्प्रभावी करने की कोशिश कर रही है।

 

अदालत ने कहा कि हालांकि न्यायपालिका आमतौर पर किसी पूरे कानून को रद्द करने से बचती है, लेकिन इस मामले में धारा 3, 5, 6, 7, 8 और 9 सीधे तौर पर संविधान के खिलाफ थीं। इन धाराओं को हटाने के बाद कानून में कुछ भी बाकी नहीं बचता, इसलिए पूरे अधिनियम को ही असांविधानिक घोषित कर रद्द कर दिया गया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने करीब 450 याचिकाओं का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि अगले तीन माह के भीतर पात्र कर्मचारियों को अदालती फैसलों के अनुरूप सभी अनुबंध सेवा लाभ सुनिश्चित करे।

इस अधिनियम के आधार पर की गई सभी कार्रवाई, लाभों की कटौती या रिकवरी के आदेश तुरंत रद्द माने जाएंगे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य विधानमंडल को ऐसे कानून बनाने का अधिकार नहीं है, जो न्यायपालिका के आदेशों को पूरी तरह से समाप्त कर दें। अदालत ने इसे शक्तियों के पृथककरण के सिद्धांत और कानून के शासन का उल्लंघन माना। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में इस तरह की दखल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से घोषित कानून सभी अदालतों और अधिकारियों पर बाध्यकारी हैं। राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कानून का सहारा लेकर कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकती।

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2003 के बाद नियुक्त कर्मियों को लाभ से वंचित करने वाला अधिनियम भेदभावपूर्ण
अदालत ने पाया कि यह अधिनियम भेदभावपूर्ण था क्योंकि यह 12 दिसंबर 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को लाभ से वंचित कर रहा था, जबकि उससे पहले नियुक्त कर्मचारियों को समान लाभ दिए जा रहे थे। कोर्ट ने दोहराया कि जो कर्मचारी आरएंडपी नियमों के तहत विज्ञापन और पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त हुए हैं, वे नियमितीकरण के बाद अपनी पिछली अनुबंध सेवा के आधार पर वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों के हकदार हैं। राज्य सरकार बार-बार अनुबंध नियुक्तियां कर कर्मचारियों का शोषण नहीं कर सकती है। यह कानून न केवल न्यायिक शक्ति पर अतिक्रमण है बल्कि संविधान की बुनियादी संरचना पर हमला है।

कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में लाया था नया अधिनियम 
हालिया विवाद का मुख्य केंद्र ताज मोहम्मद और लेख राम बनाम हिमाचल मामले थे। इन मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी की नियुक्ति आरएंडपी नियमों के तहत विज्ञापन और खुली प्रतियोगिता (जैसे लोक सेवा आयोग) के जरिये हुई है, तो नियमित होने के बाद उसकी अनुबंध सेवा को वरिष्ठता और वेतन वृद्धि के लिए गिना जाना चाहिए। सरकार ने इन फैसलों के खिलाफ रिव्यू याचिकाएं भी दायर की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। सरकार ने इस अदालती मैंडमस आदेश को खत्म करने के लिए नया कानून 2025 बना दिया। कोर्ट ने फैसले में विस्तार से बताया कि कैसे 1970 के दशक से ही सरकार नियमित भर्ती के बजाय तदर्थ नियुक्तियां करती रही।

सुप्रीम कोर्ट जाने पर मंथन कर रही सरकार
कोर्ट से अधिनियम रद्द होने पर प्रदेश सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। शनिवार को कोर्ट के फैसले के बाद महाधिवक्ता कार्यालय और कार्मिक विभाग के उच्च अधिकारियों के बीच लंबी बैठक हुई। सूत्रों ने बताया कि मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला एक-दो दिन में हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ भी प्रदेश महाधिवक्ता का कार्यालय मामले से जुड़े तथ्याें को लेकर चर्चा में जुट गया है।

वित्तीय मजबूरियों का तर्क खारिज
सरकार ने तर्क दिया था कि अनुबंध कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान लाभ देने से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा और वरिष्ठता सूची अस्त-व्यस्त हो जाएगी। कोर्ट ने सरकार की वित्तीय मजबूरियों के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि वित्तीय बाधाओं के नाम पर कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

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कहा- फैसलों के आधार को खत्म करने की कोशिश न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला 
कोर्ट ने पाया कि अधिनियम की धारा 8 में जानबूझकर अनुबंध के आधार पर शब्द को नियमितीकरण द्वारा से बदल दिया गया ताकि पुराने फैसलों का आधार ही खत्म हो जाए। इसे अदालत ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया। वहीं, कोर्ट ने कहा कि यह एक्ट लोक सेवा आयोग की भूमिका को सीमित करता है और कार्यकारी शक्तियों को मनमानी करने की छूट देता है।

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हिमाचल हाईकोर्ट में सरकार की ओर से बनाए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम की सांविधानिकता को चुनौती दी गई थी। एक्ट को रद्द करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में सरकार की 50 वर्षों पुरानी नियुक्ति नीतियों की आलोचना की है। स्पष्ट किया कि इस निर्णय में मुख्य रूप से नए अधिनियम की कानूनी वैधता की जांच की जा रही है।


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