मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई, सिंघवी ने उठाए कई कानूनी सवाल

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कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि जिस निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) के आधार पर नामांकन खारिज किया गया, उस पर अब तक किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान ही नहीं लिया है।

 

सिंघवी ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) की धारा 33ए के तहत उम्मीदवार को केवल उन आपराधिक मामलों का खुलासा करना होता है, जिनमें दो वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराध में सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय (चार्ज फ्रेम) किए जा चुके हों। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में न तो आरोप तय हुए हैं और न ही किसी अदालत ने संज्ञान लिया है, इसलिए नामांकन निरस्त करने का आधार कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

 

सुनवाई के दौरान सिंघवी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 का हवाला देते हुए कहा कि किसी निजी शिकायत में संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में केवल नोटिस जारी किया गया है, जबकि संज्ञान लेने और आरोप तय होने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

 

इस दौरान न्यायमूर्ति पीके मिश्रा ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के खिलाफ समन तभी जारी किया जाता है, जब मजिस्ट्रेट प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो जाए। इस पर सिंघवी ने कहा कि केवल समन या नोटिस जारी होना संज्ञान लिए जाने के बराबर नहीं माना जा सकता और कानून में दोनों की अलग-अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

सिंघवी ने अदालत को घटनाक्रम बताते हुए कहा कि 9 जून को नामांकन निरस्त करने का आदेश पारित हुआ, 10 जून को चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया गया और 11 जून को मामले का सुप्रीम कोर्ट में उल्लेख किया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें आशंका थी कि चुनाव परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे और बाद में ऐसा ही हुआ।कांग्रेस की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने मामले में मनमाने ढंग से कार्रवाई की। सिंघवी ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ विधिसम्मत रूप से लंबित आपराधिक मामला न हो और उसमें आरोप तय न किए गए हों, तब तक केवल निजी शिकायत के आधार पर उम्मीदवार को चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।

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न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि पूरी कठिनाई यह है कि यदि हम आपका नामांकन स्वीकार कर लेते हैं, तो अनुच्छेद 329 के तहत अधिकार क्षेत्र का विभाजन हो जाएगा। एक प्रकार के मामले उच्च न्यायालय देखेगा और दूसरे, जहां स्पष्ट मामला हो, अनुच्छेद 32 के तहत आएंगे। इन दोनों शक्तियों में अंतर कैसे किया जाएगा? हम लगातार कहते आए हैं कि चाहे नामांकन गलत तरीके से ही क्यों न खारिज किया गया हो, उसका उपचार चुनाव याचिका के माध्यम से है। हमें ऐसा कोई फैसला दिखाइए जिसमें हमने चुनाव प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप किया हो?

 

बता दें कि गुरुवार को नटराजन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की थी। अवकाशकालीन पीठ के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर ने मामले की शीघ्र सुनवाई का आश्वासन दिया था। सिंघवी ने पीठ को बताया कि गुरुवार नामांकन वापसी की अंतिम तिथि थी। उन्होंने तर्क दिया कि यदि मामले की तत्काल सुनवाई नहीं हुई तो याचिकाकर्ता को प्रभावी राहत पाने के लिए छह वर्ष तक इंतजार करना पड़ सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी अनुरोध किया कि विवाद के अंतिम निपटारे तक चुनाव परिणाम की घोषणा पर रोक लगाई जाए। हालांकि, न्यायमूर्ति मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस चरण पर कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया और मामले को शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्णय लिया।

भाजपा ने लगाई थी आपत्ति
रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी तथा भारत निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग का विरोध किया था। गौरतलब है कि कांग्रेस नेता ने शीर्ष अदालत का रुख उस समय किया, जब रिटर्निंग ऑफिसर ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा उठाई गई आपत्तियों के आधार पर उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया। भाजपा की ओर से दावा किया गया कि नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में तेलंगाना की एक अदालत में लंबित मामले का उल्लेख नहीं किया था। यह आपत्ति पूर्व कॉरपोरेट अधिकारी ए. श्रीलता द्वारा चौथी अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी अदालत में दायर याचिका पर आधारित थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नटराजन ने कुंभम शिवकुमार रेड्डी को राजनीतिक संरक्षण दिया, जिन पर श्रीलता ने छेड़छाड़ और आपराधिक धमकी सहित कई आरोप लगाए थे।

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कांग्रेस ने बताई सियासी साजिश
नटराजन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे सियासी साजिश बताया है। उन्होंने हैदराबाद की अदालत में श्रीलता की याचिका का भी विरोध किया है। इससे पहले कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया था कि रिटर्निंग ऑफिसर निष्पक्ष नहीं हैं और सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश से कांग्रेस की एकमात्र राज्यसभा उम्मीदवार रहीं नटराजन ने दावा किया कि उनका नामांकन रद्द कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने केंद्र की भाजपा सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा था कि रिटर्निंग ऑफिसर स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण की तरह कार्य करने के बजाय सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं।


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