चांदीपुरा वायरस- अब राजस्थान में संक्रमण की दस्तक, बच्चों में इंसेफेलाइटिस को लेकर अलर्ट

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चांदीपुरा वायरस- अब राजस्थान में संक्रमण की दस्तक, बच्चों में इंसेफेलाइटिस को लेकर अलर्ट

गुजरात के कई शहरों में करीब दो महीने से रिपोर्ट किए जा रहे चांदीपुरा वायरस के मामले स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक अब तक राज्य में 59 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। चांदीपुरा वायरस के कारण एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का खतरा देखा जाता रहा है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ गंभीर और जानलेवा जोखिमों वाला मानते हैं। छोटे बच्चों में एईएस के मामले गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं।

जून की शुरुआत से, गुजरात में 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के कई मामले सामने आए हैं। 31 जुलाई 2024 तक देश में एईएस के 148 मामले रिपोर्ट किए गए हैं। इसमें गुजरात के 24 जिलों से 140, मध्य प्रदेश से 4, राजस्थान से 3 और महाराष्ट्र में एक मामला सामने आयाहै। एईएस से अब तक 59 लोगों की मृत्यु हो गई है।

चांदीपुरा और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के जोखिमों को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सभी लोगों को अलर्ट किया है।

राजस्थान में भी पहुंचा चांदीपुरा वायरस
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी उपायों और महामारी को लेकर विस्तृत जांच करने में गुजरात सरकार की सहायता के लिए नेशनल जॉइन्ट आउटब्रेक रिस्पांस टीम (एनजेओआरटी) भी तैनात की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात सहित चांदीपुरा वायरस का खतरा कई राज्यों में बढ़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। गुजरात के बाद राजस्थान में भी अब इस वायरल संक्रमण का खतरा देखा जा रहा है।

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बच्चों को संक्रमण से कैसे बचाएं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों को इस संक्रामक रोग से सुरक्षित रखने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। प्रभावित क्षेत्रों में खेतों या झाड़ियों में जाने से बचें। मच्छरों, टिक्स और मक्खियों से बचाव करें। संक्रमण के लक्षणों के बारे में जानना और समय रहते इलाज प्राप्त करना सबसे आवश्यक हो जाता है। स्वच्छता और जागरूकता ही इस बीमारी के खिलाफ उपलब्ध एकमात्र उपाय है।

चांदीपुरा वायरस का अभी तक कोई उचित इलाज नहीं है। संक्रमण का समय रहते पता लगाने और उपचार प्राप्त होने से रोगी की जान बचाई जा सकती है।


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