केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब अपना रिकॉर्ड नौवां लगातार केंद्रीय बजट पेश करने जा रही हैं, तब भारतीय अर्थव्यवस्था ‘गोल्डीलॉक्स’ दौर (संतुलित विकास) में है, जहां तेज आर्थिक वृद्धि और कम महंगाई साथ-साथ दिखाई दे रही है। लेकिन इसी दौरान वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता भी बढ़ी हुई है। भू-राजनीतिक संकट और टैरिफ युद्धों ने वैश्विक व्यापार को अभूतपूर्व तरीके से प्रभावित किया है, जिससे वित्त मंत्री की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
वित्त मंत्री यह भी जानती हैं कि भारत के मजबूत दिखने वाले आर्थिक आंकड़े कुछ अंतर्निहित चुनौतियों को छिपाते हैं। मौजूदा आर्थिक विस्तार मुख्य रूप से सरकारी खर्च पर आधारित है, जबकि निजी निवेश, उपभोग और निर्यात जैसे अन्य विकास के प्रमुख स्तंभ अपेक्षाकृत कमजोर बने हुए हैं। उच्च विकास दर को बनाए रखने के लिए इन सभी क्षेत्रों का मजबूत योगदान जरूरी होगा, और बजट से उम्मीद की जा रही है कि वह इसके लिए आवश्यक प्रोत्साहन देगा।
सुधारों की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। इस बजट में ऐसे दस प्रमुख कारकों की पहचान की है, जिन पर खास नजर रहेगी और जो भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दिशा तय करेंगे।
तेज विकास के बावजूद अर्थव्यवस्था के सामने नई चिंता
अच्छी खबर यह है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था में से एक बना हुआ है। सरकार के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार, 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 7.4% रहने का अनुमान है। आर्थिक आंकड़ों की गुणवत्ता सुधारने के लिए भारत 2022-23 को नया आधार वर्ष अपनाने जा रहा है, जो 2011-12 के पुराने आधार वर्ष की जगह लेगा। नई शृंखला से अर्थव्यवस्था में आए संरचनात्मक बदलावों की बेहतर तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि अगले महीने इसके लागू होने के बाद विकास दर के आंकड़े किस तरह सामने आते हैं। लेकिन नीति-निर्माताओं के लिए ज्यादा चिंता का विषय नाममात्र वृद्धि दर (नॉमिनल ग्रोथ) है, जो महंगाई को भी समायोजित नहीं कर पा रही है। 8% की नाममात्र वृद्धि दर, बजट में 2025-26 के लिए अनुमानित 10.1% से कम है। इसका सीधा मतलब यह है कि राजस्व जुटाने में कमी आ सकती है। सवाल यह है कि यह कमी कितनी गंभीर होगी और क्या सरकार अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने के लिए खर्च में कटौती करेगी।
घाटा लक्ष्य के करीब सरकार, लेकिन कर्ज पर सवाल
कम कर राजस्व के बावजूद सरकार के इस वर्ष 4.4% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने की उम्मीद है। इसमें गैर-कर राजस्व में बढ़ोतरी खासकर भारतीय रिजर्व बैंक से मिलने वाले अधिक लाभांश और कुछ खर्चों में कटौती से मदद मिलने की संभावना है। हाल के वर्षों में सरकार ने राजकोषीय अनुशासन पर खास ध्यान दिया है और इस दिशा में उसका प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। महामारी के बाद 2020-21 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9.2% के उच्च स्तर पर पहुंच गया था। यह लक्ष्य हासिल करने में देरी को देखते हुए खास माना जा सकता है, क्योंकि वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम के तहत मार्च 2008 तक राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3% तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन 17 साल बाद भी यह लक्ष्य अब तक दूर बना हुआ है।
सरकार ने घोषणा की है कि अगले वित्त वर्ष से राजकोषीय अनुशासन को मापने के लिए राजकोषीय घाटे की बजाय जीडीपी के अनुपात में कर्ज को आधार बनाया जाएगा। साथ ही, सरकार ने यह भी कहा है कि 2030-31 तक जीडीपी के अनुपात में सरकारी कर्ज को 50% से नीचे लाया जाएगा। अब सवाल यह है कि क्या सरकार बाजारों की उम्मीद के अनुसार कर्ज घटाने के लिए साल-दर-साल स्पष्ट रोडमैप पेश करेगी।
निजी क्षेत्र में जोखिम लेने की प्रवृत्ति अब भी कम
उच्च ब्याज दरों के अलावा कमजोर मांग और कम क्षमता उपयोग को निजी निवेश में कमी के प्रमुख कारण माना जा रहा है, जबकि सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए हैं। सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की है और बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च किया है, ताकि निजी निवेश को गति मिल सके।
अर्थव्यवस्था में निवेश का संकेतक माने जाने वाले सकल स्थायी पूंजी निर्माण (GFCF) में हाल के वर्षों में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया है। 2007-08 में, जब भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्यमी उत्साह का आखिरी बड़ा उछाल देखने को मिला था, तब GFCF जीडीपी के 35.8% के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। हाल ही में सरकार ने मांग को बढ़ावा देने के लिए कर दरों में कटौती की है और कारोबार करने में आसानी सुधारने के लिए विनियमन में ढील देने की घोषणा की है। अब सवाल यह है कि निजी क्षेत्र को झिझक छोड़कर निवेश के लिए प्रेरित करने के लिए वित्त मंत्री और क्या कदम उठा सकती हैं।
गुणवत्तापूर्ण खर्च: केंद्र की रणनीति असरदार, राज्यों के सामने बड़ी चुनौती
केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में खर्च के मामले में संतुलित और समझदारी भरा रुख अपनाया है। उसने अनावश्यक राजस्व खर्च में कटौती की है और पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) को बढ़ाया है। कुल राजस्व खर्च का जीडीपी में हिस्सा 2021-22 में 13.6% से घटकर 2025-26 में 11.1% रह गया है। वहीं, पूंजीगत व्यय पर खर्च 2021-22 में ₹5.9 ट्रिलियन से बढ़कर 2025-26 के लिए बजट में ₹11.2 ट्रिलियन तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कैपेक्स पर जोर देने से अर्थव्यवस्था में मल्टीप्लायर प्रभाव मजबूत हुआ है। अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें भी इसी तरह की रणनीति अपनाएं। हालांकि ब्याज-मुक्त 50 साल के ऋण के कारण राज्यों ने पूंजीगत खर्च बढ़ाया है, लेकिन अनावश्यक राजस्व खर्च घटाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं।
कुछ राज्यों पर वेतन, ब्याज और पेंशन जैसे प्रतिबद्ध खर्च का बोझ काफी अधिक है, जिसे कम करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। ऐसा न कर पाने पर उन्हें ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है। अब सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री राज्यों को अपने खर्च की गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रोत्साहित करेंगी।
कर संग्रह की चुनौती: बढ़ती अर्थव्यवस्था, लेकिन कमजोर राजस्व
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में आम तौर पर सरकार के लिए राजस्व जुटाना सबसे बड़ी चिंता नहीं होनी चाहिए। लेकिन भारत के मामले में स्थिति अलग रही है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार जीडीपी के अनुपात में करों का हिस्सा बढ़ाने के लिए संघर्ष करती रही है। 2021-22 से 2024-25 के बीच जीडीपी में करों का हिस्सा 11.5% से बढ़कर 11.9% हुआ है। चालू वित्त वर्ष में इसे 12% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इसके पूरा होने की संभावना कम दिख रही है।
कम नाममात्र वृद्धि दर और जीएसटी व आयकर दरों में तेज कटौती के कारण राजस्व संग्रह पर असर पड़ा है। केयरएज रेटिंग्स के अनुसार, 2025-26 में कर राजस्व लक्ष्य से कम से कम ₹3 ट्रिलियन कम रह सकता है। इससे सरकार के वित्तीय गणित में बड़ी कमी पैदा हो सकती है।
ऐसे में सरकार ने गैर-कर राजस्व पर भरोसा बढ़ाया है, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से मिलने वाले अधिक लाभांश शामिल हैं। अब सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री कर आधार बढ़ाने और कर संग्रह सुधारने के लिए नए और प्रभावी उपाय पेश करेंगी।
सरकारी कर्ज 85% के पार, सस्ते कर्ज की राह अब भी दूर
भारत जैसे उभरते हुए देश के लिए राजकोषीय घाटे और उससे जुड़ी सरकारी उधारी को कम करना बेहद ज़रूरी है। ऊंचा घाटा सीधे तौर पर अधिक उधारी को जन्म देता है, जिससे कर्ज़ बाजार में निजी क्षेत्र के लिए जगह सिमट जाती है और ब्याज दरें ऊपर चली जाती हैं। यही वजह है कि भारतीय उद्योगों को अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कर्ज पर कम से कम 400 बेसिस पॉइंट अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए केंद्र और राज्यों, दोनों को अपनी उधारी में तेज कटौती करनी होगी। 2025-26 में केंद्र सरकार का कर्ज़ जीडीपी के 55% पर आंका गया है। यदि राज्यों की उधारी को भी जोड़ लिया जाए, तो कुल सरकारी कर्ज़ का अनुपात बढ़कर 85.23% तक पहुंच जाता है। हालांकि केंद्र ने अपने कर्ज़ को घटाने के लिए एक रोडमैप घोषित किया है, लेकिन राज्यों की स्थिति कहीं अधिक चिंताजनक है।
जब तक ब्याज दरें नीचे नहीं आतीं, तब तक घरेलू उद्योग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाएगा, खासकर ऐसे समय में जब बाहरी आर्थिक माहौल पहले से ही अस्थिर है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या वित्त मंत्री सरकार की बढ़ती उधारी पर लगाम लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठा पाएंगी, या यह बोझ अर्थव्यवस्था और उद्योग दोनों पर यूं ही भारी बना रहेगा।
कैपेक्स 3.1% पर अटका, राजकोषीय अनुशासन बनाम ग्रोथ की दुविधा
निजी निवेश को पुनर्जीवित करने को लेकर सरकार की सक्रियता समझ में आती है। बीते कुछ वर्षों में उसने बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च के जरिए आर्थिक वृद्धि को सहारा दिया है। 2021-22 से 2025-26 के बीच जीडीपी के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की हिस्सेदारी 2.5% से बढ़कर 3.1% हो गई है। इसके साथ ही राज्यों को 50 साल के ब्याज-मुक्त ऋण देकर उन्हें भी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया।
लेकिन अब यह रणनीति अपनी सीमा तक पहुंचती दिख रही है, और इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला, राजकोषीय जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्धताओं के चलते सरकार की इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े पैमाने पर खर्च करने की क्षमता सीमित होती जा रही है। यही वजह है कि कैपेक्स का हिस्सा जीडीपी के 3.1% पर ठहरता नजर आ रहा है। दूसरा, अर्थव्यवस्था की यह क्षमता भी सवालों के घेरे में है कि वह बजट में तय पूंजीगत व्यय को पूरी तरह आत्मसात कर पाए। पिछले कुछ वर्षों में बजट में तय कैपेक्स का पूरा उपयोग नहीं हो सका है। 2024-25 में तो बजट अनुमान के मुकाबले खर्च में 9% की कमी रही। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बार वित्त मंत्री पूंजीगत व्यय को और बढ़ाने का जोखिम लेंगी? और अगर लेंगी भी, तो कितनी सीमा तक।
महंगाई का दबाव: आम आदमी की चिंता, सरकार के सामने सवाल
रोजगार की चुनौती: बढ़ती अर्थव्यवस्था, लेकिन नौकरियों पर सवाल
नॉन-टैक्स रेवेन्यू की कमजोर कड़ी बना विनिवेश, हर साल लक्ष्य से बड़ी चूक
हाल के वर्षों में केंद्र सरकार की नॉन-टैक्स रेवेन्यू पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन एक ऐसा नॉन-टैक्स स्रोत है जिसे सरकार लगातार नजरअंदाज करती रही है विनिवेश। आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हर साल सरकार की मंशा और जमीनी अमल के बीच बड़ा फासला रहता है। चालू वित्त वर्ष भी इससे अलग नहीं है।
बजट में जहां ₹47,000 करोड़ के विनिवेश का लक्ष्य रखा गया था, वहीं जनवरी की शुरुआत तक सरकार सिर्फ ₹8,768 करोड़ ही जुटा सकी है। सरकार की बड़ी उम्मीद IDBI Bank में अपनी 30% हिस्सेदारी की बिक्री से थी, जिससे करीब ₹36,000 करोड़ मिलने का अनुमान था। लेकिन प्रक्रियागत देरी के चलते यह सौदा FY26 में भी होता दिख नहीं रहा।
सरकार के कुछ अधिकारी तर्क देते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को पहले दुरुस्त किया जा रहा है, ताकि विनिवेश के समय बेहतर मूल्य मिल सके।
सरकार ने यह भी कहा था कि वह परिसंपत्तियों की बिक्री पर जोर देकर नॉन-टैक्स रेवेन्यू बढ़ाएगी, लेकिन इस मोर्चे पर भी अब तक खास प्रगति नहीं दिखी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या घटती आय वित्त मंत्री को विनिवेश को लेकर ज्यादा गंभीर रुख अपनाने के लिए मजबूर करेगी, या यह मौका एक बार फिर हाथ से निकल जाएगा।








