राममंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में बड़ा खुलासा: ऊपर से थे मामला रफा-दफा करने के निर्देश, तब शुरू हुई लीपापोती

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राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में एक बड़ा खुलासा हुआ है। दरअसल, चोरी का मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने दिल्ली में बैठे शीर्ष पदाधिकारियों व अधिकारियों को जानकारी दी थी। वहीं से निर्देश मिले कि मामले को किसी तरह से खत्म करो। तब ये सभी पदाधिकारी खुद जांच अधिकारी बनकर संदिग्धों से पूछताछ करने लगे और रुपयों की बरामदगी करने लगे। जब मामला मीडिया में पहुंचा तो सभी सकते में आ गए। भद्द पिटने के बाद पहले एसआईटी जांच की सिफारिश और आखिर में केस दर्ज कराया।

  • चढ़ावा चोरी छह जून को पकड़ में आ गई थी। ट्रस्ट व मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों ने ही ये खेल पकड़ा था। चूंकि रकम बड़ी थी और मिलीभगत भी गणनाकर्मियों से लेकर बड़े लोगों की थी, इसलिए तुरंत कोई कार्रवाई करने को लेकर निर्णय नहीं लिया गया।
  • सूत्रों के मुताबिक, जांच में आए कुछ तथ्यों से पता चलता है कि एक पदाधिकारी ने इस बारे में ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों व दिल्ली के अधिकारियों को जानकारी दी। खबर सुनते ही हर कोई हैरान था। लिहाजा, ये तय हुआ कि इसको किसी तरह से रफादफा किया जाए। क्योंकि अगर मामला बाहर आया तो बदनामी होगी। इसलिए वहीं से पूरा मैनेजमेंट शुरू हो गया था। लेकिन ये सब काम नहीं आया। राज का पर्दाफाश हो गया।

 

ये वजह भी थी दबाने की…पता था खुद पर आएगी आंच
ट्रस्ट के ही कुछ पदाधिकारियों को पता था कि चढ़ावा चोरी का दाग उन पर भी लगेगा। क्योंकि उससे संबंधित तथ्य भी उनके पास थे। इसलिए वह भी चाहते थे कि किसी तरह से मामला यहीं पर खत्म हो जाए। जब ऊपर से निर्देश मिले तो और पुख्ता तरीके से ये सभी चोरी पर पर्दा डालने में जुट गए। इनमें अनिल मिश्रा और गोपाल राव प्रमुख थे। चंपत राय पूरा मैनेजमेंट कर रहे थे।

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सूचना बाहर कैसे गई, इसकी भी होती रही जांच
सूत्रों ने बताया कि जब चोरी की करतूत उजागर हो गई तो ट्रस्ट के पदाधिकारी ये जांच कर रहे थे कि मीडिया तक सूचना किसने पहुंचाई। उनके अपने ही कई कर्मचारियों व अधिकारियों पर शक था। वह चोरी करने वालों और जिम्मेदारों पर कानूनी कार्रवाई के बजाय घटना की जानकारी मंदिर परिसर के बाहर कैसे पहुंची, इसको लेकर पूरा जोर दे रहे थे।


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