अयोध्या के बहेलिय टोला मोहल्ले मे बसंत पंचमी के इस शुभ अवसर पर रेड गढ़ने कों लेकर मोहल्ले के लोग मे एक उत्सव के रुप मे मनाया गया ऐसा माना जाता है कि
बसंत पंचमी का दिन भारतीय संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन से न केवल विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा होती है, बल्कि पारंपरिक रूप से होली के उत्सव की शुरुआत भी हो जाती है।
जैसा कि आपने उल्लेख किया, कई क्षेत्रों (विशेषकर उत्तर भारत और ग्रामीण इलाकों) में बसंत पंचमी के दिन चौराहे पर ‘होली का डांडा’ गाड़ने की परंपरा है।
होली का डांडा गाड़ना
यह उत्सव का सबसे मुख्य हिस्सा है। बसंत पंचमी के दिन गांव या मोहल्ले के मुख्य चौराहे पर एक लकड़ी का खंभा (डांडा) गाड़ा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब होली के त्योहार की तैयारी आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है।
फाग का गायन और गुलाल
डांडा गाड़ने के बाद लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। इसी दिन से लोकगीतों और फाग (होली के गीत) गाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृंदावन) में तो इस दिन से मंदिरों में गुलाल उड़ना शुरू हो जाता है।
लकड़ियां इकट्ठा करना
एक बार जब यह ‘डांडा’ गड़ जाता है, तो इसके चारों ओर लोग होलिका दहन के लिए लकड़ियां, सूखे पत्ते और उपले (कंडे) इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। यह प्रक्रिया अगले 40 दिनों तक (फाल्गुन पूर्णिमा तक) चलती है।
ऋतु परिवर्तन का स्वागत
बसंत पंचमी को ऋतुराज बसंत के आगमन का उत्सव माना जाता है। होली का डांडा गाड़ना यह दर्शाता है कि अब शीत ऋतु विदा ले रही है और प्रकृति में रंगों और खुशियों का मौसम आ गया है। इस कार्यक्रम मे साम्लित लोग कृष्णा, संजीत, मनोज, गोविन्द,







