सुलह की असंभव-सी लगती मेज पर आज अमेरिका-ईरान आमने-सामने, 11 साल बाद सीधी बातचीत के आसार

Spread the love

 

 

1979 में जब ईरान में इस्लामिक क्रांति आई, तब अमेरिका और ईरान के बीच की दोस्ती टूट गई। तब से दोनों देश सीधे बात करने से बचते रहे। 47 बाद दोनों देशों के बीच छह हफ्ते का युद्ध हुआ। फिर संघर्ष विराम की घोषणा हुई। अब अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार को बातचीत होगी। यह साफ नहीं है कि दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बातचीत करेंगे या अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व दोनों देशों के नेताओं तक संदेश का आदान-प्रदान करने का काम करेगा? विश्व मीडिया के मुताबिक, बुनियादी मतभेद अभी भी वहीं हैं और इस्लामाबाद में शनिवार को कूटनीति का इम्तेहान होना है।

 

इस्लामाबाद में हो क्या हो रहा है?

ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल शनिवार को इस्लामाबाद में होंगे। छह हफ्तों के युद्ध के बाद अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शुक्रवार को पाकिस्तान रवाना हुए। उनके साथ हैं राष्ट्रपति के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, जिन्होंने फरवरी में बातचीत के एक असफल दौर का नेतृत्व किया था। ईरान की तरफ से संसद अध्यक्ष मोहम्मद गलीबाफ इस बैठक का नेतृत्व करेंगे।

यह 1979 के बाद पहली बार होगा जब अमेरिका और ईरान के अधिकारी इस स्तर पर आमने-सामने बैठेंगे। इस्लामाबाद में तैयारियां पूरे जोश के साथ चल रही हैं। रेड अलर्ट जारी है। 10,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं और सभी प्रवेश बिंदु बंद कर दिए गए हैं। सुरक्षा कारणों से प्रतिनिधिमंडलों के आने का कोई कार्यक्रम सार्वजनिक नहीं किया गया है। उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने बातचीत के लिए पाकिस्तान आने वाले प्रतिनिधियों के लिए वीजा ऑन अराइवल की घोषणा की है।

 

इस बैठक से क्या उम्मीद की जा सकती है?

सीएनएन के अनुसार, नतीजों के लिहाज से बहुत कम उम्मीद है। ईरान के साथ बातचीत श्रेष्ठ परिस्थितियों में भी समय लेने वाली और जटिल होती है। इस्लामाबाद में कोई बड़ी सफलता नहीं मिलेगी, लेकिन प्रतीकात्मकता के लिहाज से काफी कुछ दांव पर है। पाकिस्तान के अखबार द डॉन के अनुसार, जो बात इसे खासतौर पर महत्वपूर्ण बनाती है, वह यह है कि बुनियादी अड़चनें अभी भी वहीं की वहीं हैं। जेडी वेंस शून्य संवर्धन की मांग को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे। यह वही मांग है, जिसे ईरान लगातार अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार पर हमला मानता आया है। तेहरान फरवरी अंत में वह बात नहीं माना था जब उसके सर्वोच्च नेता हमले में मारे गए थे। अब जब वह जानता है कि वह काफी मजबूत स्थिति से बातचीत कर रहा है, तो उसके झुकने की संभावना और भी कम है।

डॉन के अनुसार, एक और बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका किसकी तरफ से बातचीत कर रहा है? खुद की या इस्राइल की? अगर कोई समझौता होता भी है तो इस बात की कोई वास्तविक गारंटी नहीं होगी कि इस्राइल का मनमाना रवैया उसे उलट नहीं देगा। इस्लामाबाद में इस बात की पहली असली परीक्षा है कि कूटनीति नए हालात में काम कर सकती है या नहीं।

और पढ़े  मनमाने सिम नहीं ले पाएंगे! 24 अगस्त से लागू होंगे नए नियम, जानिए कितने नंबर रख सकते हैं आप

 

क्या संघर्ष विराम पर खतरा है?

अमेरिका और ईरान के अधिकारी पाकिस्तान में शांति वार्ता की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन ईरान की सेना ने शुक्रवार को संकेत दिया कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बनाए रखेगी। साथ ही चेतावनी दी कि अगर इस्राइल लेबनान में हिज्बुल्लाह पर हमले जारी रखता है तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। इससे दो हफ्ते के संघर्ष विराम के टिक पाने पर संदेह और बढ़ गया है।

1979 से पहले अमेरिका और ईरान के बीच कैसे रिश्ते थे?

1979 से पहले अमेरिका और ईरान करीबी सहयोगी थे। अमेरिका शाह के शासन को मजबूत करना चाहता था। अमेरिका ने तेल के हितों को सुरक्षित करने के लिए 1953 के तख्तापलट का समर्थन किया था। उसने असैन्य परमाणु सहयोग भी दिया। यह सब 1979 की इस्लामी क्रांति तक चला।

1979 के बाद दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत के क्या-क्या मौके आए?

 

  • 2013 का फोन कॉल
    • 27 सितंबर 2013 में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी के बीच पहली सीधी बातचीत हुई। 15 मिनट के फोन कॉल में दोनों ने औपचारिक बातें कीं, जिससे तेहरान को कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से राहत की उम्मीद जगी।

 

  • 2015 की वार्ता
    • वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एकमात्र मिसाल ओबामा के दूसरे कार्यकाल में थी, जब तत्कालीन विदेश मंत्री जॉन केरी 2015 में ईरानी विदेश मंत्री जवाद जरीफ से नियमित रूप से मिले। ये बातचीत एक साल से भी ज्यादा चली। हर दौर से पहले और बाद में दोनों पक्षों की विशेषज्ञ टीमें स्विट्जरलैंड और वियना में हफ्तों और महीनों तक परमाणु समझौते के विवरण पर काम करती रहीं।
और पढ़े  अमेरिका में 2 गोलीकांड: वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में चली गोलियां, मिशिगन में छह की मौत, कब थमेगा मौत का सिलसिला?

 

  • 2015 का ऐतिहासिक हाथ मिलाना
    • 28 सितंबर 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा और ईरानी विदेश मंत्री जवाद जरीफ की संयुक्त राष्ट्र महासभा में आकस्मिक मुलाकात हुई। दोनों ने हाथ मिलाए, जिसे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना गया।

 

  • 2015 का परमाणु समझौता
    • 2015 में ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका और पांच अन्य विश्व शक्तियों यूके, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने ईरान के साथ जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ईरान की परमाणु क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत के बदले में काफी सीमित करने के लिए बनाया गया था।
  • 2018 में ट्रंप ने समझौता तोड़ा
    • राष्ट्रपति ट्रंप ने 8 मई 2018 को JCPOA से आधिकारिक रूप से बाहर निकलते हुए इसे भयानक एकतरफा समझौता बताया जो अमेरिका से ज्यादा ईरान को फायदा पहुंचाता था।

ओबामा प्रशासन और ट्रंप प्रशासन के नजरिए में क्या फर्क है?

ओबामा प्रशासन ने 2015 के समझौते की दिशा में केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की। ट्रंप प्रशासन एक व्यापक समझौता चाहता था, जो ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और हिज्बुल्लाह तथा हूतियों के लिए उसके समर्थन को भी सीमित करे। राष्ट्रपति ट्रंप का मुख्य युद्ध लक्ष्य था- ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना। यह वर्षों से अमेरिका के नेतृत्व में चली कूटनीति का भी लक्ष्य रहा था। ट्रंप का मानना था कि ओबामा का 2015 का समझौता बहुत कमजोर था।

जॉन केरी ने क्या चेतावनी दी और नेतन्याहू को लेकर उन्होंने क्या खुलासा किया?

पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने चेताया कि ईरान के साथ युद्ध में राष्ट्रपति ट्रंप की नीति से व्यापक वैश्विक और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने संघर्ष विराम पर भी सवाल उठाए। केरी का कहना था कि इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को सैन्य कार्रवाई की ओर धकेला। और यह नया नहीं है। नेतन्याहू ने पहले राष्ट्रपति जो बाइडन और बराक ओबामा को भी ईरान पर इसी तरह के हमलों के लिए प्रेरित किया था, लेकिन दोनों ने उन प्रस्तावों को खारिज किया और तनाव बढ़ाने से इनकार किया।

और पढ़े  म्यांमार में फिर भूकंप से हिली धरती, 3.5 की तीव्रता, फिलहाल नुकसान की खबर नहीं

पाकिस्तान इस पूरे समीकरण में कहां है?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का दावा है कि उन्होंने इस संघर्ष विराम में मध्यस्थता करने में मदद की है। डॉन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेडी वेंस से पहले तत्कालीन उपराष्ट्रपति जो बाइडन ने 2009 और 2011 में दो बार पाकिस्तान का दौरा किया था। 2011 में इस्लामाबाद में अपने छह घंटे के प्रवास के दौरान बाइडन ने राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से बात की थी।

इस बातचीत में चुनौतियां क्या हैं?

  • पहली चुनौती- शून्य संवर्धन बनाम ईरान की संप्रभुता। अमेरिका की मांग वही है, जो ईरान ने फरवरी में तब भी नहीं मानी थी, जब वह कमजोर था।
  • दूसरी चुनौती- इस्राइल का सवाल। क्या अमेरिका खुद की तरफ से बातचीत कर रहा है या इस्राइल की? अगर समझौता हुआ भी तो इस्राइल उसे उलट सकता है।
  • तीसरी चुनौती- होर्मुज। ईरान ने साफ कर दिया है कि जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण रहेगा।

Spread the love
  • Related Posts

    हैदराबाद में कार की टक्कर से महिला की मौत, जनसेना पार्टी के राज्यसभा सांसद के बेटे पर केस दर्ज

    Spread the love

    Spread the loveतेलंगाना के हैदराबाद में तेज रफ्तार कार की टक्कर से 26 वर्षीय महिला की मौत हो गई। हादसा 16 अगस्त को माधापुर इलाके में इनऑर्बिट मॉल के सामने…


    Spread the love

    2 हफ्ते में परमाणु बम बना लेता ईरान’: ट्रंप का तेहरान हमलों पर बड़ा दावा, होर्मुज पर कब्जे को लेकर क्या कहा?

    Spread the love

    Spread the loveअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान से जुड़े रणनीतिक जलमार्गों पर “लगभग नियंत्रण” कर रहा है और जल्द ही वहां पूरी तरह नियंत्रण हासिल…


    Spread the love