BREAKING- कनाडा,ब्रिटेन,और ऑस्ट्रेलिया ने फलस्तीन को दी मान्यता, इस्राइल-अमेरिका विरोध के बीच बड़ा एलान

ब्रिटेन ने औपचारिक रूप से फलस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दे दी है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने रविवार को यह एलान किया। यह कदम अमेरिका और इस्राइल के कड़े विरोध के बावजूद उठाया गया। स्टार्मर ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य फलस्तीनियों और इस्राइलियों के लिए शांति की उम्मीद को जीवित रखना है। इससे पहले कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी यह मान्यता दे चुके हैं।

स्टार्मर ने कहा कि भले ही यह फैसला प्रतीकात्मक है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है जब दोनों समुदायों के बीच स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए जाएं। स्टार्मर का कहना है कि यह मान्यता केवल हमास को नहीं बल्कि फलस्तीन की जनता को दी जा रही है। उन्होंने साफ कहा कि हमास का भविष्य में शासन में कोई स्थान नहीं होगा और उसे सात अक्तूबर 2023 के हमलों में पकड़े गए इस्राइली बंधकों को तुरंत रिहा करना होगा।
पीएम कार्नी का एलान
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर घोषणा की कि उनकी सरकार ने फलस्तीन को मान्यता दे दी है। उन्होंने पहले ही जुलाई में संकेत दिया था कि वह यह कदम उठाएंगे। कार्नी ने कहा कि यह मान्यता दो-राज्य समाधान की दिशा में शांति बहाल करने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
ऑस्ट्रेलिया ने भी दी मान्यता
ऑस्ट्रेलिया ने औपचारिक रूप से फलस्तीन राज्य को मान्यता दे दी है। यह फैसला गाजा युद्ध और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच आया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा से पहले ऑस्ट्रेलिया का यह एलान पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
अमेरिका और इस्राइल की नाराजगी
यह घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ब्रिटेन यात्रा के कुछ ही दिनों बाद हुई। ट्रंप ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि यह कदम आतंकवाद को बढ़ावा देगा और गलत संदेश देगा। इस्राइली सरकार ने भी इसका कड़ा विरोध किया है।

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उनका कहना है कि जब तक हमास और फलस्तीन आपसी विभाजन से बाहर नहीं आते, तब तक इस तरह की मान्यता बेकार है। आलोचकों का तर्क है कि यह फैसला एक “खाली इशारा” है क्योंकि फलस्तीन आज भी वेस्ट बैंक और गाजा में बंटा हुआ है और उसकी कोई अंतरराष्ट्रीय राजधानी मान्य नहीं है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्रिटेन और फ्रांस का पिछले सौ वर्षों से पश्चिम एशिया की राजनीति में गहरा दखल रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद ब्रिटेन ने फलस्तीन का नियंत्रण अपने हाथ में लिया था। 1917 की बैलफोर घोषणा भी ब्रिटेन ने ही की थी, जिसमें यहूदियों के लिए राष्ट्रीय घर स्थापित करने की बात कही गई थी।  लेकिन उसी घोषणा में यह भी शर्त थी कि फलस्तीनियों के धार्मिक और नागरिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। डिप्टी प्रधानमंत्री डेविड लैमी ने कहा कि यह अधिकार अब तक नहीं दिए गए, जो ऐतिहासिक अन्याय है और आज भी जारी है।

फलस्तीनी प्रतिक्रिया
ब्रिटेन में फलस्तीन मिशन के प्रमुख हुसाम जोमलोत ने बीबीसी से कहा कि यह मान्यता औपनिवेशिक दौर की गलतियों को सुधारने जैसा है। उन्होंने कहा कि आज का दिन उस ऐतिहासिक इनकार को खत्म करने का दिन है, जो 1917 से चल रहा है।

आज ब्रिटिश जनता को जश्न मनाना चाहिए कि इतिहास सुधारा जा रहा है। उनका कहना था कि यह मान्यता केवल कूटनीतिक कदम नहीं बल्कि राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है।

बदलाव की दिशा
ब्रिटेन दशकों से दो-राज्य समाधान का समर्थन करता रहा है, लेकिन अब तक उसका मानना था कि मान्यता तभी दी जानी चाहिए जब शांति समझौता हो। अब हालात बदल चुके हैं। गाजा में करीब दो साल से जारी संघर्ष, लाखों लोगों का विस्थापन और वेस्ट बैंक में इस्राइल की बस्तियों का लगातार विस्तार ने ब्रिटेन को यह मान्यता देने पर मजबूर कर दिया। लैमी ने कहा कि हमें दो-राज्य समाधान को जीवित रखना होगा। गाजा, वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम के बच्चों का भविष्य इसी पर निर्भर है।

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