दिल्ली का रामलीला मैदान: रामकथा से सियासी संघर्ष तक… 175 वर्षों का ऐतिहासिक सफर, लोकतंत्र की लंबी यात्रा

दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर सियासी संघर्ष का केंद्र बना है। रविवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के विरोध में इंडिया गठबंधन ने यहां बड़ी रैली की। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है, जब इस मैदान से सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद हुई हो। आजादी के आंदोलन से लेकर आपातकाल विरोधी संघर्ष, अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन और कई ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाओं तक रामलीला मैदान भारतीय लोकतंत्र के उतार-चढ़ाव का गवाह रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत सियासत से नहीं, बल्कि रामकथा के मंचन से हुई थी।

दरअसल, जिस स्थान पर आज रामलीला मैदान है, वह कभी इंद्रपत गांव का हिस्सा था और यहां एक बड़ा तालाब हुआ करता था। 1850 के दशक में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने यहां रामलीला के मंचन की शुरुआत कराई। इससे इस स्थान की अलग पहचान बनी। हालांकि, 1883 में ब्रिटिश शासन ने इसे सैनिक शिविर में तब्दील कर दिया और रामलीला के आयोजन पर रोक लगा दी। बाद में पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से 1911 में यहां दोबारा रामलीला शुरू हुई। यह परंपरा आज भी जारी है।
आजादी के आंदोलन से राष्ट्रीय पहचान तक
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामलीला मैदान राष्ट्रीय नेताओं की जनसभाओं का प्रमुख केंद्र बन गया था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने यहां सभाओं के जरिए लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। 1955 में स्थायी मंच और बाउंड्री बनने के बाद मैदान की अहमियत और बढ़ गई। 1961 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने यहां जनसभा को संबोधित किया। वहीं, 1963 में चीन के साथ युद्ध के बाद लता मंगेशकर ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में ”ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत प्रस्तुत किया। 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ”जय जवान, जय किसान” का नारा भी इसी मैदान से देशभर में गूंजा।
आपातकाल के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक
25 जून 1975 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ऐतिहासिक रैली ने रामलीला मैदान को लोकतांत्रिक प्रतिरोध की पहचान दिलाई। ”सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” के नारे ने तत्कालीन सत्ता के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता को नई ताकत दी। आपातकाल से ठीक पहले हुई इस रैली को भारतीय राजनीति के निर्णायक घटनाक्रमों में गिना जाता है। 1977 में जनता पार्टी के नेताओं ने भी इसी मैदान से साझा मंच के जरिए नई राजनीतिक धारा का संदेश दिया।
आंदोलनों से लेकर शपथ ग्रहण तक
21वीं सदी में भी रामलीला मैदान की राजनीतिक अहमियत बरकरार रही। 2011 में बाबा रामदेव ने काले धन के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि इसी साल अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को देशव्यापी बहस का केंद्र बना दिया। उनके अनशन को व्यापक जनसमर्थन मिला और इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ा। यह मैदान केवल विरोध प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रहा। 2013 में अरविंद केजरीवाल ने यहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की पहली बार शपथ ली। वहीं, 2025 में भाजपा सरकार बनने के बाद रेखा गुप्ता का शपथ ग्रहण समारोह भी इसी मैदान में आयोजित हुआ। इस तरह डेढ़ सदी से अधिक के सफर में रामलीला मैदान धार्मिक आयोजन स्थल से आगे बढ़कर देश की राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां कभी रामकथा का मंचन हुआ तो कभी सत्ता के खिलाफ आंदोलन गूंजे। यही वजह है कि दिल्ली का यह मैदान भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक खास स्थान रखता है।
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