अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच मदर ऑफ ऑल बॉम्ब के संभावित इस्तेमाल की चर्चा हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने ईरान के ऊर्जा और परमाणु ठिकानों पर हमले की योजना में इस बम को भी शामिल किया है।
अमेरिका इस बम के जरिए ईरान के ऊर्जा ढांचे और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के विकल्प पर विचार कर रहा है। इनमें पहाड़ के भीतर स्थित पिकैक्स माउंटेन नाम के संदिग्ध परमाणु ठिकाने का भी जिक्र है।
क्या है मदर ऑफ ऑल बॉम्ब?
अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक, मदर ऑफ ऑल बॉम्ब का आधिकारिक नाम जीबीयू-43/बी मैसिव ऑर्डनेंस एयर ब्लास्ट है। इसका संक्षिप्त नाम एमओएबी है। यह अमेरिका का विकसित किया गया एक बड़ा, सटीक निशाना लगाने वाला पारंपरिक विस्फोटक बम है। इसे अमेरिका के सबसे शक्तिशाली गैर-परमाणु हथियारों में गिना जाता है।
- इसका वजन करीब 21,600 पाउंड यानी लगभग 9,800 किलोग्राम है।
- इसकी लंबाई करीब 30 फीट है।
- इसके बंद होने पर चौड़ाई लगभग पांच फीट और खुलने पर करीब 10 फीट हो जाती है।
- इसका व्यास लगभग 40.5 इंच है।
- इस बम में करीब 18,700 पाउंड यानी लगभग 8,480 किलोग्राम एच-6 विस्फोटक होता है।
- इसमें बीएलयू-120/बी वॉरहेड का इस्तेमाल किया जाता है।
- एच-6 विस्फोटक की क्षमता टीएनटी से लगभग 1.35 गुना ज्यादा है। यानी समान वजन की तुलना में इससे करीब 35 फीसदी ज्यादा ऊर्जा निकल सकती है।
कैसे काम करता है यह बम?
एमओएबी को सामान्य बमों की तरह सीधे विमान से गिराने के बजाय एक विशेष व्यवस्था के जरिए छोड़ा जाता है। इसे सी-130 श्रेणी के विमान से गिराने के लिए एक खास क्रैडल यानी सहारा देने वाली संरचना में रखा जाता है। इसके लिए एमसी-130 टैलन-2 या विशेष रूप से तैयार सी-130 विमान का इस्तेमाल किया जा सकता है।
विमान से बाहर निकलने के बाद बम उस क्रैडल से अलग हो जाता है। इसके बाद इसके पंख और जालीदार फिन इसे हवा में स्थिर रखने और सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करते हैं।
इसमें केएमयू-593/बी जीपीएस और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल होता है। जीपीएस उपग्रहों की मदद से स्थान की जानकारी देता है, जबकि इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम बम की गति और दिशा का अनुमान लगाने में मदद करता है। इन प्रणालियों के सहारे बम को तय लक्ष्य की ओर निर्देशित किया जाता है।
इसकी खासियत यह है कि यह बड़ा और भारी होने के बावजूद निर्देशित तरीके से लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बनाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य सतह पर बड़े क्षेत्र में विस्फोट का प्रभाव पैदा करना है, न कि किसी मजबूत संरचना को भेदते हुए बहुत गहराई में पहुंचना। इसलिए किसी गहरे भूमिगत ठिकाने पर इसका असर उस ठिकाने की बनावट, गहराई और सुरक्षा पर निर्भर करेगा।
कब और क्यों बनाया गया था एमओएबी?
एमओएबी को 2003 में विकसित किया गया था। इसे बनाने का काम अमेरिकी वायुसेना की अनुसंधान प्रयोगशाला के म्यूनिशन्स निदेशालय और अन्य सैन्य इकाइयों ने संबंधित एजेंसियों और ठेकेदारों के सहयोग से किया था। इसका विकास फ्लोरिडा के एग्लिन एयर फोर्स बेस से जुड़ा था।
इसे पुराने बीएलयू-82 डेजी कटर बम के बेहतर विकल्प के रूप में तैयार किया गया। डेजी कटर एक बड़ा लेकिन बिना निर्देशित बम था, जिसका इस्तेमाल वियतनाम युद्ध और बाद में अफगानिस्तान में किया गया था। इसके उलट, एमओएबी में उपग्रह आधारित मार्गदर्शन की सुविधा दी गई, जिससे इसे लक्ष्य की ओर अधिक सटीक तरीके से भेजा जा सके।
एमओएबी का विकास तेजी से किया गया। विकास का ठेका मिलने से लेकर इसे सैन्य अभियान वाले क्षेत्र में पहुंचाने तक की प्रक्रिया करीब 10 महीने में पूरी कर ली गई।
कब-कब किया गया इसका परिक्षण?
इसे इराक में अमेरिकी सैन्य अभियान की तैयारी के दौरान विकसित किया गया था। उस समय अमेरिका के रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने कहा था कि इसका उद्देश्य सद्दाम हुसैन पर दबाव बनाना था, ताकि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों की मांगें मानें। हालांकि, इराक युद्ध में एमओएबी का इस्तेमाल नहीं किया गया।
पहली बार कहां और कब इस्तेमाल हुआ?
एमओएबी का युद्ध में पहली बार इस्तेमाल 13 अप्रैल 2017 को अफगानिस्तान में किया गया था। इसे पूर्वी अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में इस्लामिक स्टेट यानी आईएसआईएस के लड़ाकों के खिलाफ गिराया गया।
अमेरिकी सेना ने इस हमले में उस सुरंग और गुफा प्रणाली को निशाना बनाया, जिसका इस्तेमाल आईएसआईएस के लड़ाके आने-जाने और छिपने के लिए करते थे। उस समय अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना अल-कायदा और आईएसआईएस के खिलाफ अभियान चला रही थी।
अफगान रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस हमले में आईएसआईएस के 36 लड़ाके मारे गए थे और किसी नागरिक के प्रभावित होने की जानकारी नहीं थी।






