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उत्तराखंड बॉर्डर से लखीमपुर खीरी तक फैले तराई के विशाल कृषि क्षेत्र में इन दिनों गहरी बेचैनी है। देश का बंटवारा, 84 के दंगे और आतंकवाद का दौर सह चुके किसानों को अब भूमिहीन होने का डर सता रहा है। उनका आरोप है कि वन विभाग खेतों के बीच अचानक अपनी जमीन बताकर खड़ी फसलों पर जेसीबी व ट्रैक्टर चला रहा है। उत्तराखंड से खीरी बॉर्डर तक सैकड़ों किसान आक्रोशित हैं। वहीं, वन विभाग इसे अतिक्रमण के खिलाफ कब्जामुक्ति अभियान बता रहा है।
‘अमर उजाला’ ने तराई क्षेत्र में जमीनी हाल जानने का प्रयास किया। गांव पस्तौर (उत्तराखंड-पीलीभीत बॉर्डर) के किसान जोगिंदर सिंह ने बताया कि जो किसान 1947 के बाद से काबिज हैं, उनके पास कागज व रजिस्ट्रियां भी हैं, फिर भी भूमि कब्जा की जा रही है। आजादी के बाद सरकार ने पाकिस्तान और पंजाब में छिनी जमीनों के बदले तराई के जंगलों में जमीनें दी थीं।
उनका कहना है कि बुजुर्गों की चूक का फायदा उठाकर लेखपालों ने कागजों में मनमानी की। कब्जे हमारे थे, इसलिए कभी सोचा नहीं कि भूमि हमसे छीनी जाएगी। जंगलों, जानवरों और मच्छरों से जूझकर भूमि कृषि योग्य बनाने वाले किसानों से जमीन और रोटी छीनी जाएगी, तो विरोध तय है।
तराई से आ रही शिकायतों की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और इंडियन फॉरेस्ट एक्ट के तहत करवाकर, अवश्य ही कारण स्पष्ट कराया जाएगा। उचित हल निकालने का प्रयास किया जाएगा।
-सुनील चौधरी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, उत्तर प्रदेश