इमेजिंग क्या होती है?
इमेजिंग का मतलब यहां सिर्फ पृथ्वी की सामान्य तस्वीर लेना नहीं है। सैटेलाइट में लगे सेंसर पृथ्वी की सतह से मिलने वाली जानकारी को रिकॉर्ड करते हैं। इस डेटा को प्रोसेस करके पृथ्वी की तस्वीर और उससे जुड़ी जरूरी जानकारी तैयार की जाती है।
इससे किसी इलाके की जमीन की स्थिति, वनस्पति में बदलाव, फसलों की वृद्धि और आपदा से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी इलाके में बाढ़ आने पर सैटेलाइट की तस्वीरों से पता लगाया जा सकता है कि पानी कितने क्षेत्र में फैला है। इसी तरह जंगल में आग लगने पर प्रभावित इलाके और आग के फैलाव की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है।
कृषि के क्षेत्र में इमेजिंग से फसलों की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखने में मदद मिल सकती है। वहीं, पर्यावरण के क्षेत्र में जमीन और वनस्पति में समय के साथ हो रहे बदलावों को समझा जा सकता है।
ईओएस-05 की इमेजिंग से क्या फायदा होगा?
- ईओएस-05 से मिलने वाली इमेजरी और डेटा का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है।
- मौसम में हो रहे बदलावों की निगरानी की जा सकती है।
- चक्रवात की स्थिति और उसकी दिशा पर नजर रखने में मदद मिल सकती है।
- बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान प्रभावित इलाकों की ताजा तस्वीरें मिल सकती हैं।
- जंगल में आग लगने पर प्रभावित क्षेत्र और आग के फैलाव की निगरानी की जा सकती है।
- कृषि में फसलों की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है।
- पर्यावरण में जमीन और वनस्पति में हो रहे बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है।
ऐसे सैटेलाइट किनके पास हैं?
- अमेरिका: जीओईएस श्रृंखला के सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से पृथ्वी की लगातार इमेजिंग करते हैं।
- जापान: हिमावारी-8 और हिमावारी-9 से मौसम और पृथ्वी की निगरानी होती है।
- चीन: फेंगयुन श्रृंखला के जियोस्टेशनरी मौसम सैटेलाइट मौजूद हैं।
- दक्षिण कोरिया: जीईओ-केओएमपीएसएटी श्रृंखला के सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से इमेजिंग करते हैं।
- यूरोप: यूरोप की ईयूएमईटीएसएटी संस्था मेटियोसैट सैटेलाइट संचालित करती है।
- भारत: इंसैट श्रृंखला के जियोस्टेशनरी सैटेलाइट पहले से मौसम संबंधी इमेजिंग करते हैं; ईओएस-05 की खासियत यह है कि यह भारत का पहला जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से इमेजिंग करने वाला अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है।
भारत के आगे के बड़े अंतरिक्ष मिशन कौन से हैं?
गगनयान: गगनयान भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसके तहत तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को करीब 400 किलोमीटर की ऑर्बिट में तीन दिन के मिशन पर भेजने की योजना है।
कार्यक्रम को जनवरी 2019 में मंजूरी मिली थी। सितंबर 2024 में इसका दायरा बढ़ाकर कुल 8 मिशन किया गया। आपकी दी हुई जानकारी के मुताबिक पहला बिना इंसान वाला परीक्षण मिशन 2026 की चौथी तिमाही में और मानव मिशन 2027 तक लक्षित है।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन: भारत पांच मॉड्यूल वाला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन विकसित कर रहा है। इसका पहला मॉड्यूल बीएएस-01 को 2028 तक लॉन्च करने और पूरे स्टेशन को 2035 तक चालू करने का लक्ष्य है।
इसका इस्तेमाल लंबे समय तक इंसानों को अंतरिक्ष में रखने, माइक्रोग्रैविटी में वैज्ञानिक शोध और उन्नत अंतरिक्ष अभियानों के लिए किया जाएगा।
स्पैडेक्स-2 और स्पैडेक्स-3: इन मिशनों में अंतरिक्ष में डॉकिंग और अनडॉकिंग तकनीक को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके तहत अंतरिक्ष यानों को आपस में जोड़ने और अलग करने के साथ सैंपल ट्रांसफर, क्रू ट्रांसफर और पावर, फ्लूड तथा प्रोपेलेंट ट्रांसफर जैसी क्षमताओं को विकसित किया जाएगा।
इन तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य के चंद्रयान-4, गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे मिशनों में किया जा सकता है।
शुक्रयान: शुक्रयान यानी वीनस ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में लॉन्च करने का लक्ष्य है। यह शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, वायुमंडल और आयनमंडल का अध्ययन करेगा। मिशन में एरोब्रेकिंग और थर्मल मैनेजमेंट जैसी उन्नत तकनीकों का भी प्रदर्शन किया जाएगा।






