बेस अस्पताल हल्द्वानी में चार करोड़ रुपये की सीटी स्कैन मशीन सरकारी तंत्र की बेरुखी और लापरवाही से कबाड़ बन गई। सड़क चौड़ीकरण के दौरान दूसरे कमरे में शिफ्ट की गई मशीन करीब डेढ़ साल से बंद पड़ी है। लंबे समय तक मरम्मत के लिए निदेशालय को पत्र और रिमाइंडर भेजे जाते रहे, लेकिन अब मशीन के पार्ट्स ही बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। लिहाजा मशीन को अनुपयोगी मानते हुए अस्पताल प्रशासन ने नई सीटी स्कैन मशीन खरीदने की मांग मुख्यालय को भेज दी है।
पहले कई बार मशीन ठीक करने के लिए मांग की गई थी, अब सीटी स्कैन मशीन के पार्ट्स नहीं मिल रहे हैं। अब इस मशीन का उपयोग नहीं किया जा सकता है। निदेशालय को पत्र भेजकर नई मशीन की खरीद के लिए पत्राचार किया गया है। -डॉ. मनोज कुमार तिवारी, पीएमएस बेस अस्पताल
कुमाऊं के अस्पतालों में नियमित नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं
किडनी रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कुमाऊं के अस्पतालों में मरीजों का डायलिसिस तो हो रहा है लेकिन नियमित नेफ्रोलॉजिस्ट आज तक तैनात नहीं हुए।
कुमाऊं के दो मेडिकल कॉलेजों अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में भी किडनी विशेषज्ञ तैनात नहीं हैं। मरीज की स्थिति की निगरानी, दवाओं में बदलाव, संक्रमण और अन्य जटिलताओं के उपचार के लिए नेफ्रोलॉजिस्ट की जरूरत होती है। केवल डायलिसिस मशीन और तकनीकी स्टाफ होने से किडनी मरीजों का पूरा उपचार संभव नहीं है। डायलिसिस कराने वाले मरीजों को विशेषज्ञ परामर्श के लिए कुमाऊं से बाहर जाना पड़ रहा है। सबसे बड़ी मार गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को मिल रही है। अकेले हल्द्वानी में ही हर रोज सात सौ से अधिक मरीज डायलिसिस के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।
बेस अस्पताल में रोजाना 70 लोगों की होती है डायलिसिस
हल्द्वानी बेस अस्पताल में डायलिसिस की नई व्यवस्था बंगाल की कंपनी संजीवनी देख रही है। यहां करीब 240 मरीज पंजीकृत हैं। 28 मशीनों में रोजाना करीब 70 मरीजों की डायलिसिस हो रही है। वहीं सुशीला तिवारी अस्पताल में आठ मशीनें हैं और प्रतिदिन पांच मरीजों की डायलिसिस हो रही है। आठ मशीनों में तीन मशीनें एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी रोगियों के लिए भी रिजर्व है।
बार-बार इंटरव्यू निकाले जा रहे हैं लेकिन कोई नहीं आ रहा है। वैकल्पिक तौर पर फिजिशियन मरीजों को देख रहे हैं। फिर से स्पेशलिस्ट के लिए इंटरव्यू निकाले जाएंगे। – आशुतोष सयाना, निदेशक चिकित्सा शिक्षा, उत्तराखंड








