₹2 हजार से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर क्या लग सकता है चार्ज, नए कानून से क्या बदल जाएगा?

Spread the love

क्या 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर चार्ज लग सकता है? संसद से एक संशोधन विधेयक पारित होने के बाद यही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। विपक्ष का दावा है कि सरकार मुफ्त यूपीआई की कानूनी गारंटी खत्म कर रही है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि अभी यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। दरअसल, कानून में ऐसा बदलाव किया गया है, जिससे भविष्य में सरकार जरूरत पड़ने पर डिजिटल भुगतान माध्यमों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने का फैसला ले सकती है।

आइए जानते हैं…

संसद से कौन सा बिल पास हुआ?

6 अगस्त को लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित हुआ। इसी विधेयक के जरिए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन किया गया है। यह संशोधन देखने में छोटा लग सकता है, लेकिन डिजिटल भुगतान व्यवस्था के लिहाज से इसे अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे सरकार को पहली बार यह अधिकार मिलेगा कि वह अधिसूचना जारी कर तय करे कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शून्य एमडीआर रहेगा और किन पर शुल्क लगाया जा सकेगा।

आखिर पहले कानून क्या कहता था?

इस बदलाव को समझने के लिए पुराने नियम को समझना जरूरी है। साल 2019 में सरकार ने देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए आयकर अधिनियम में धारा 269SU जोड़ी थी। इसके तहत एक निश्चित कारोबार वाले व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान स्वीकार करना अनिवार्य किया गया था। इसके साथ ही पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में धारा 10A जोड़ी गई थी।

इस धारा में साफ लिखा गया था कि जिन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को सरकार अधिसूचित करेगी, उन पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर किसी भी तरह का शुल्क नहीं लगा सकेंगे। बाद में सरकार ने यूपीआई, भीम-यूपीआई, यूपीआई क्यूआर कोड और रुपे डेबिट कार्ड को इस सूची में शामिल कर दिया। इसी वजह से जनवरी 2020 से यूपीआई पूरी तरह शुल्क-मुक्त हो गया।

अब कानून में क्या बदला गया है?

  • पहले कानून खुद कहता था कि इन डिजिटल भुगतान माध्यमों पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। लेकिन अब संशोधन के बाद यह स्थायी कानूनी छूट हटा दी गई है।
  • अब इसकी जगह केंद्र सरकार समय-समय पर अधिसूचना जारी करके तय करेगी कि किस डिजिटल भुगतान माध्यम पर शून्य एमडीआर रहेगा और किन पर मर्चेंट शुल्क लगाया जा सकेगा। यानी फैसला अब सीधे सरकार के हाथ में होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार ने यूपीआई पर एमडीआर लगा दिया है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अगर भविष्य में सरकार ऐसा करना चाहे, तो उसके पास इसके लिए कानूनी अधिकार होगा।

क्या अभी यूपीआई पर चार्ज लग गया है?

इस सवाल का जवाब है नहीं। बिल में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है कि यूपीआई पर तुरंत एमडीआर लागू होगा। अभी भी यूपीआई से भुगतान करने पर कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा है। यानी अगर आप दुकान पर क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान कर रहे हैं या किसी को यूपीआई से पैसे भेज रहे हैं, तो पहले की तरह कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा। फिलहाल केवल कानून बदलने जा रहा है, नियम नहीं। जब तक सरकार अलग से अधिसूचना जारी नहीं करती, तब तक यूपीआई पहले की तरह मुफ्त रहेगा।

और पढ़े  विधानसभा उपचुनाव नतीजे- बांकीपुर में दूसरे राउंड में भी प्रशांत किशोर आगे,दतिया में कांग्रेस आगे, मांजलपुर में कौन पीछे?

 

आखिर एमडीआर होता क्या है?

एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट, यह वह शुल्क है जो किसी डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के बदले व्यापारी बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है।
उदाहरण के लिए जब कोई ग्राहक कार्ड या किसी डिजिटल माध्यम से भुगतान करता है तो उस लेनदेन को पूरा करने में बैंक, पेमेंट नेटवर्क और पेमेंट कंपनियां काम करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया की लागत निकालने के लिए व्यापारी से एक छोटा शुल्क लिया जाता है, जिसे एमडीआर कहा जाता है।

भारत में अभी भी क्रेडिट कार्ड पर लगभग 1.5 प्रतिशत तक और डेबिट कार्ड पर करीब 0.9 प्रतिशत तक एमडीआर लिया जाता है। लेकिन यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड पर जनवरी 2020 से एमडीआर शून्य है। यानी इन पर कोई मर्चेंट शुल्क नहीं लगता।

सरकार यह बदलाव क्यों करना चाहती है?

सरकार का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम पेमेंट प्रणालियों में शामिल हो चुका है। सिर्फ जुलाई 2026 में यूपीआई के जरिए 23.6 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये रही। इतनी बड़ी भुगतान व्यवस्था को सुरक्षित, तेज और लगातार बेहतर बनाए रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है।आरटीजीएस व एनईएफटी जैसे रियल टाइम भुगतान पर पहले से सेवा शुल्क लिया जाता है।

उद्योग से जुड़े अधिकारियों का भी लंबे समय से कहना है कि यूपीआई पर कोई एमडीआर नहीं मिलने के कारण बैंक, फिनटेक कंपनियां और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर इस व्यवस्था से पर्याप्त कमाई नहीं कर पाते। उनका तर्क है कि लगातार बढ़ते डिजिटल भुगतान के बीच बिना किसी राजस्व के तकनीक, साइबर सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना मुश्किल होता जा रहा है।

 

क्या सभी यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जा सकता है?

फिलहाल इसका जवाब है नहीं। सरकार ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि एमडीआर लागू होगा या नहीं और अगर होगा तो किन लेनदेन पर होगा। लेकिन उद्योग और सरकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला विकल्प यह है कि एक निश्चित राशि से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर ही एमडीआर लगाया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि छोटे व्यापारियों को इससे बाहर रखा जाए और केवल बड़े कारोबारियों पर मर्चेंट शुल्क लागू किया जाए।

और पढ़े  Shooting- अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना में अंधाधुंध गोलीबारी, कई लोगों की मौत, एक घायल का इलाज जारी

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने क्या कहा?

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। उनके मुताबिक सरकार फिलहाल केवल कानून में संशोधन कर रही है। आगे क्या व्यवस्था होगी, यह बाद में तय होगा। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान जैसी सार्वजनिक व्यवस्था को लगातार मजबूत बनाने के लिए निवेश जरूरी है और इसकी लागत किसी न किसी को उठानी ही होगी। उन्होंने दो संभावित मॉडल बताए;

  • पहला, सरकार टैक्स के जरिए इस खर्च को वहन करे।
  • दूसरा, ‘यूजर पे’ मॉडल अपनाया जाए, जिसमें एमडीआर के जरिए लागत पूरी की जाए।

मल्होत्रा ने कहा कि अगर एमडीआर लागू होता है तो सामान्यतः इसका भुगतान व्यापारी करते हैं। लेकिन अगर एमडीआर नहीं भी लगाया जाता, तब भी डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर होने वाला खर्च आखिरकार टैक्स के जरिए आम जनता ही उठाती है। उनके अनुसार सबसे जरूरी बात यह है कि यूपीआई जैसी सार्वजनिक डिजिटल व्यवस्था में निवेश लगातार जारी रहे।

 

 

 

विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?

कांग्रेस ने इस संशोधन का जोरदार विरोध किया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश का कहना है कि सरकार मुफ्त यूपीआई की कानूनी गारंटी खत्म कर रही है। उनके मुताबिक पहले कानून खुद यह सुनिश्चित करता था कि यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, लेकिन अब यह फैसला सरकार की अधिसूचना पर निर्भर करेगा।

कांग्रेस का कहना है कि अगर भविष्य में एमडीआर लागू होता है तो व्यापारी इसकी भरपाई सामान और सेवाओं की कीमत बढ़ाकर ग्राहकों से कर सकते हैं। यानी शुल्क भले ही सीधे ग्राहक से न लिया जाए, लेकिन उसका असर आम लोगों तक पहुंच सकता है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार भविष्य में 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने कहा कि महंगाई से परेशान लोगों पर यह अतिरिक्त बोझ होगा और सरकार आम जनता से और वसूली करना चाहती है।

जयराम रमेश ने यह भी कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने केंद्र सरकार को 2.86 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रांसफर किया है। उनका तर्क है कि इस राशि का एक हिस्सा डिजिटल भुगतान व्यवस्था को चलाने के लिए पर्याप्त है, इसलिए अलग से एमडीआर लगाने की जरूरत नहीं है।

अमेरिकी रिपोर्ट का जिक्र क्यों हो रहा है?

कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि यह बदलाव अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की 2026 की रिपोर्ट के बाद लाया गया है। जयराम रमेश का कहना है कि उस रिपोर्ट में भारत के मुफ्त यूपीआई और रुपे मॉडल पर सवाल उठाए गए थे। उनका आरोप है कि इससे विजा और मास्टरकार्ड जैसी विदेशी कंपनियां प्रभावित हुई हैं और सरकार उसी दिशा में कदम बढ़ा रही है। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।

और पढ़े  Attack: लाल सागर में भारतीय जहाज पर हमला, डूबा कार्गो पोत, 13 भारतीय नाविकों को सुरक्षित बचाया गया

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्या कहा?

विपक्ष के आरोपों के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा कि यूपीआई पर तुरंत शुल्क लगाए जाने की बातें गलत हैं। उन्होंने कहा कि टैक्सेशन एंड अदर लॉज (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर गलत जानकारी फैलाई जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने संसद के भीतर इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा करने के बजाय बाहर बयानबाजी की। अगर पार्टी को आपत्ति थी तो वह सदन में विस्तार से अपनी बात रख सकती थी। वित्त मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि एमडीआर का संबंध व्यापारियों से होता है, ग्राहकों से नहीं। उनके मुताबिक अगर भविष्य में ऐसी व्यवस्था लागू होती भी है तो उसका उद्देश्य बैंकों और फिनटेक कंपनियों को डिजिटल भुगतान के इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और नई तकनीक में निवेश के लिए संसाधन उपलब्ध कराना होगा। इससे अंततः यूपीआई उपयोगकर्ताओं को ही बेहतर और सुरक्षित सेवाएं मिलेंगी।

 

 

क्या 2000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर लगाया जाएगा शुल्क?

रॉयटर्स न्यूज एजेंसी मुताबिक, जिस प्रस्ताव पर चर्चा हुई है, उसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.3% से 0.5% तक एमडीआर लगाया जा सकता है। यह भी केवल उन व्यापारियों पर लागू हो सकता है, जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है। यानी छोटे व्यापारियों और आम ग्राहकों को इससे बाहर रखा जा सकता है। हालांकि सरकार ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।

जैफरीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान कुल मर्चेंट ट्रांजैक्शन की संख्या का केवल लगभग 4% हैं, लेकिन कुल मूल्य का करीब 67% इन्हीं लेनदेन का होता है। अगर ऐसा मॉडल लागू होता है तो डिजिटल भुगतान उद्योग के लिए 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व तैयार हो सकता है।

आम लोगों पर क्या असर होगा?

फिलहाल आम लोगों के लिए कोई बदलाव नहीं है। यूपीआई पहले की तरह मुफ्त है और ग्राहक को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ रहा है। सरकार की ओर से भी कहा गया है कि अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है जिससे ग्राहकों पर सीधा असर पड़े। अगर भविष्य में सरकार एमडीआर लागू करने का फैसला करती है, तब भी यह अलग अधिसूचना के जरिए होगा। उस समय यह तय किया जाएगा कि शुल्क किन लेनदेन पर लगेगा, किन व्यापारियों पर लागू होगा और क्या छोटे कारोबारियों या ग्राहकों को इससे बाहर रखा जाएगा। फिलहाल इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।


Spread the love
  • Related Posts

    झारखंड के प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में उतरी CJP, प्रतिनिधिमंडल पहुंच रहा रांची

    Spread the love

    Spread the loveकॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि पार्टी झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है। उन्होंने कहा…


    Spread the love

    लोकसभा में पास हुआ बिल: क्या अब UPI पेमेंट करने पर देना होगा अतिरिक्त चार्ज?जानें सबकुछ

    Spread the love

    Spread the loveआज के इस समय में लोग कैश से अधिक यूपीआई एप के जरिए पेमेंट करते हैं। इसमें न तो कैश रखने की झंझट होती है और न ही…


    Spread the love