साल 2010 में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 45 रुपये हुआ करती थी, जो मार्च 2026 में गिरकर 94.82 रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है। पिछले डेढ़ दशक में डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 109% की गिरावट आई है, जो औसतन 4.7% सालाना की दर से है। एक निवेशक और आम नागरिक के तौर पर यह समझना जरूरी है कि दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद भारतीय मुद्रा लगातार दबाव में क्यों है।
सवाल: रुपये के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण क्या है?
जवाब: इसका सबसे बड़ा कारण भारत और अमेरिका के बीच लगातार बना रहने वाला महंगाई का अंतर है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई ऐतिहासिक रूप से 5-6% के बीच रही है, जबकि अमेरिका में यह अमूमन 2% के आसपास रहती है। जब भारत में कीमतें अमेरिका की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती हैं, तो रुपये की क्रय शक्ति कम हो जाती है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए रुपये का नाममात्र अवमूल्यन (मूल्य घटना) जरूरी हो जाता है।
जवाब: मार्च 2026 में पश्चिम एशिया (विशेषकर ईरान) में युद्ध की स्थिति के कारण कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, इस हालात ने भारत के आयात बिल को असहनीय स्तर तक बढ़ा दिया। इसके साथ ही, वैश्विक जोखिम बढ़ने पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफआईआई व एफपीआई) ने सुरक्षित निवेश (डॉलर और सोना) में निवेश के लिए भारतीय इक्विटी और ऋण बाजारों से 11 बिलियन डॉलर से अधिक की भारी निकासी की। वहीं, जनवरी 2026 में भारत में सोने के आयात में भी 349% का भारी उछाल भी देखा गया था। इन कारकों ने बाजार में डॉलर की मांग को अचानक बढ़ा दिया, इससे रुपया 94.82 के निचले स्तर पर आ गया। शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 94.18 पर खुला और पहली बार 94.50 का स्तर पार करते हुए आखिरकार 89 पैसे की भारी गिरावट के साथ 94.85 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले बुधवार को यह 93.96 पर बंद हुआ था।
डाॅलर के मुकाबले रुपये में गिरावट का सफर
| वर्ष | औसत विनिमय दर | गिरावट का कारण |
| 2010 | 45.14 | वैश्विक रिकवरी और स्थिर पूंजी प्रवाह |
| 2013 | 58.59 | टेपर टैंट्रम संकट |
| 2016 | 67.19 | विमुद्रीकरण और वैश्विक अनिश्चितता |
| 2020 | 74.13 | कोविड-19 महामारी और वैश्विक लॉकडाउन |
| 2023 | 82.50 | फेडरल रिजर्व द्वारा आक्रामक ब्याज दर वृद्धि |
| 2025 | 87.40 | अमेरिकी टैरिफ और व्यापार युद्ध का प्रभाव |
| 2026 (मार्च) | 94.82 | पश्चिम एशिया में युद्ध संकट और डॉलर की चरम मांग |
सवाल: व्यापार घाटा और अमेरिकी नीतियां रुपये को कैसे प्रभावित कर रही हैं?
जवाब: भारत का व्यापार घाटा रुपये के मूल्य पर दबाव डालने वाला एक निरंतर कारक है। जनवरी 2026 में भारत का व्यापार घाटा 34.68 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था और फरवरी 2026 में यह 27.10 बिलियन डॉलर रहा। इसके अलावा, 2025 में अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए 50% तक के चयनात्मक टैरिफ ने नया भू-राजनीतिक जोखिम पैदा किया है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, रुपया इन ऊंचे-ऊंचे टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में काम कर रहा है, ताकि भारतीय सामान वैश्विक बाजार में सस्ते रहें और निर्यात प्रतिस्पर्धी बना रहे।
सवाल: रिजर्व बैंक और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों का क्या असर होता है?
जवाब: फरवरी 2026 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 50 बेसिस पॉइंट की कटौती की, जिससे फेड फंड दर 4.75%-5.00% के दायरे में आ गई, जबकि RBI ने अपनी रेपो दर 5.25% पर स्थिर रखी है। यह संकुचित होता ब्याज दर अंतर विदेशी निवेशकों के लिए ‘कैरी ट्रेड’ के आकर्षण को कम करता है। इसके अलावा, भारत में मुद्रा आपूर्ति की वृद्धि दर आमतौर पर 10-12% रहती है, जो अमेरिकी मनी सप्लाई (5% के आसपास) वृद्धि से अधिक है, जो लंबे में रुपये पर दबाव डालता है।
सवाल: रुपये की गिरावट को रोकने के लिए आरबीआई क्या कर रहा है?
जवाब: भारत का केंद्रीय बैंक होने के नाते आरबीआई रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप करता है। हाल-फिलहाल मार्च 2026 तक उपलब्ध लगभग 723 अरब डॉलर के विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग इसके लिए किया गया है। इससे बीते कुछ हफ्तों में विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दिखी है। मार्च के पहले सप्ताह में युद्ध संकट के दौरान आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में सीधे तौर पर लगभग 12 से 15 बिलियन डॉलर बेचे थे। इसके साथ ही आरबीआई अपतटीय (देश के बाहर) एनडीएफ बाजार और प्री-मार्केट में भी डॉलर बेचकर सट्टेबाजों से रुपये को बचाने की जुगत लगाता है।
सवाल: क्या लगातार कमजोर होते रुपये का मतलब कमजोर अर्थव्यवस्था है?
जवाब: बिल्कुल नहीं। रुपये का किसी भी मुद्रा के साथ विनिमय दर केवल एक व्यापारिक संतुलन का उपकरण है। उदाहरण के लिए, जापानी येन डॉलर के मुकाबले पिछले एक दशक में बहुत अधिक कमजोर हुआ हुआ है, फिर भी जापान अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ईरान भी इसका एक बड़ा उदाहरण है। बीते एक दशक में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की मुद्रा डॉलर के मुकाबले कहीं नहीं टिकती। हालांकि आज जब ईरान और अमेरिका आमने-सामने हैं, ईरान अपनी कमजोर मुद्रा के बावजूद दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सामने तन कर खड़ा है। रुपये का ₹94.82 के स्तर तक गिरना घरेलू मुद्रा में कमजोरी के बजाय वैश्विक डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक कारणों से है और इससे भारत की 8.2% की शानदार जीडीपी वृद्धि दर पर कोई बड़ा नकारात्मक असर पड़ता फिलहाल नहीं दिखता। हालांकि, अर्थव्यवस्था को चुनौतीपूर्ण हालातों का सामना समय-समय पर जरूर करना पड़ेगा।
सवाल: अब भविष्य के लिए रुपये की राह क्या?
जवाब: 2010 से 2026 रुपये की चाल को नजदीक से देखने पर पता चलता है कि यह संरचनात्मक तौर पर अवमूल्यन के दौर से गुजर रहा है। आने वाले पांच वर्षों में, यदि भारत अपनी विकास दर को सात फीसदी से ऊपर बनाए रखने में सफल होता है और ऊर्जा सुरक्षा (ईवी, सौर ऊर्जा) के मोर्चे पर अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत कर राजकोषीय घाटे काबू में लाता है, तो रुपया डॉलर के मुकाबले ₹95-₹98 के दायरे में स्थिर हो सकता है। इसके अलावा 2026 के खत्म होते-होते अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से संभावित और अधिक ब्याज दर कटौती रुपये को बड़ी राहत दे सकती है।







