Scam: दिवंगत अजित पवार और डिप्टी CM सुनेत्रा पवार को राहत, 25000 करोड़ के घोटाले में क्लीन चिट

मुंबई की एक विशेष अदालत ने आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की उस रिपोर्ट को मान लिया है, जिसमें महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (शिखर बैंक) में लोन बांटते समय करीब 25,000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में दिवंगत उप मुख्यमंत्री अजित पवार और उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को क्लीन चिट दी गई थी। कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए कहा है कि मामले में कोई भी सजा लायक अपराध साबित नहीं हुआ है।

 

विशेष अदालत ने आर्थिक अपराध शाखा की दिवंगत उपमुख्यमंत्री की ‘सी-समरी’ रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इससे अजित पवार समेत उन सभी राजनीतिक नेताओं को राहत मिली, जिसका नाम इस घोटाले में शामिल था। अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए कहा कि कथित 25,000 करोड़ रुपये के घोटाले के मामले में कोई दंडनीय अपराध साबित नहीं हुआ है।

70 से अधिक अन्य लोगों को क्लीन चिट
मुंबई की एक विशेष अदालत ने आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा 25,000 करोड़ रुपये के महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) मामले में दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिससे महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, दिवंगत उपमुख्यमंत्री अजीत पवार और इस मामले में 70 से अधिक अन्य लोगों को क्लीन चिट मिल गई।

कोई आपराधिक अपराध नहीं बनता
अदालत ने कार्यकर्ता अन्ना हजारे और अन्य द्वारा दायर विरोध याचिकाओं के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर हस्तक्षेप याचिका को भी खारिज कर दिया। विशेष न्यायाधीश महेश जाधव ने सी-सारांश रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिसमें कहा गया था कि सहकारी चीनी कारखानों से जुड़े कथित ऋण और वसूली अनियमितताओं में कोई आपराधिक अपराध नहीं बनता है। इस आदेश में ईओडब्ल्यू के इस निष्कर्ष का भी समर्थन किया गया कि अजित पवार, सुनेत्रा पवार, उनके रिश्तेदारों और अन्य संस्थाओं से संबंधित लेन-देन में ‘कोई आपराधिक अपराध’ नहीं था।

तीन प्रमुख लेन-देन की जांच
यह मामला 2019 में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा एमएससीबी और जिला सहकारी बैंकों पर लगे आरोपों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश के बाद शुरू हुआ था। इन बैंकों ने चीनी कारखानों को ब्याज मुक्त ऋण जारी किए ताकि बैंक अधिकारियों और राजनेताओं से जुड़े लोगों के पक्ष में ऋण खाते बनाए जा सकें। यह भी आरोप लगाया गया कि कंपनियों ने बाद में अपनी यूनिट संपत्तियों को बेहद कम कीमतों पर बेच दिया। ईओडब्ल्यू की 35 पन्नों की क्लोजर रिपोर्ट में तीन प्रमुख लेन-देन की जांच की गई और ऋण स्वीकृत करने या सतारा में जरंदेश्वर शुगर सहकारी कारखाना सहित चीनी कारखानों की बिक्री में कोई आपराधिक अनियमितता नहीं पाई गई।

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1343 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली
आरोप लगाया गया था कि कारखानों को अलाभकारी पाया गया, फिर उन्हें गैर-निष्पादित संपत्ति घोषित कर दिया गया और पवार परिवार के स्वामित्व वाली कंपनियों सहित बैंक अधिकारियों और राजनेताओं के रिश्तेदारों से जुड़ी कंपनियों को बहुत कम कीमतों पर बेच दिया गया। ईओडब्ल्यू ने अब कहा है कि बैंक को कोई नुकसान नहीं हुआ है, और यह भी कहा है कि उसने जांच के दायरे में आए ऋणों से 1343 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली कर ली है।

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