जय बदरी विशाल के जयघोष के साथ मंगलवार को अपराह्न दो बजकर 56 मिनट पर बदरीनाथ मंदिर के कपाट शीतकाल में छह माह के लिए बंद कर दिए गए हैं। सेना की मधुर बैंड धुन और श्रद्धालुओं के कीर्तन-भजन से बदरीशपुरी गुंजायमान हाे उठी। धाम में करीब 5000 श्रद्धालु कपाट बंद होने के साक्षी बने।
कपाट बंद होने के मौके पर बदरीनाथ मंदिर को फूूलों से सजाया गया था। मंगलवार सुबह पांच बजे बदरीनाथ की महाभिषेक पूजा हुई। इसके बाद बाल भोग व दिन का भोग लगाया गया। इस बीच मंदिर में श्रद्धालु भगवान बदरीनाथ के दर्शन करते रहे। भोग लगने के पश्चात रावल अमरनाथ नंबूदरी ने सायंकालीन पूजाएं संपन्न की।
अपराह्न डेढ़ बजे से कपाट बंद होने की प्रक्रिया शुरू हुई। बदरीनाथ के रावल (मुख्य पुजारी) अमरनाथ नंबूदरी ने स्त्री वेश धारण कर माता लक्ष्मी मंदिर से लक्ष्मी की मूर्ति को बदरीनाथ गर्भगृह में विराजमान किया।
इसके बाद माणा गांव की महिलाओं द्वारा बुनकर तैयार किए गए घृतकंबल को बदरीनाथ भगवान को ओढ़ाया गया। इस दौरान बदरीश पंचायत में विराजमान उद्धव और कुबेर की प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह से मंदिर प्रांगण में लाया गया।

बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी सहित धर्माधिकारी, वेदपाठी व अन्य आचार्यगण मंदिर की परिक्रमा करने के बाद सिंहद्वार से होते हुए बाहर आए। अपराह्न ठीक दो बजकर 56 मिनट पर बदरीनाथ मंदिर और सिंहद्वार के कपाट बंद कर दिए गए। सायंकाल को कुबेर की उत्सव डोली रात्रि प्रवास के लिए बामणी गांव पहुंची।







