2026 चुनाव- बंगाल में 25 साल बाद 2 चरणों में हो रहे हैं चुनाव, निर्वाचन आयोग ने बताई क्या है वजह

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चुनाव आयोग ने रविवार (15 मार्च) को चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है। इनमें असम, केरल, पुदुचेरी, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु शामिल हैं। असम, केरल, पुदुचेरी और तमिलनाडु में एक ही चरण में चुनाव कराए जाएंगे, जबकि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव होंगे।

 

इस दौरान जब मुख्य चुनाव आयुक्त से यह पूछा गया कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव क्यों कराए जा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में पहले चुनाव आठ चरणों में कराए जाते थे, लेकिन इस बार चुनाव दो चरणों में होंगे। इस संबंध में आयोग ने विस्तृत विचार-विमर्श किया था और यह उचित समझा कि चरणों की संख्या कम की जाए ताकि प्रक्रिया सभी के लिए अधिक सुविधाजनक हो सके। पिछले चुनावों में हिंसा में शामिल रहे पुलिस अधिकारियों के संबंध में भी सूची हमारे पास उपलब्ध है और उनके खिलाफ कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

25 साल बाद बंगाल में सिर्फ दो चरणों में वोटिंग होगी
आखिरी बार साल 2001 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव सिर्फ एक चरण में हुए थे।

  • 2006 में पांच चरण
  • 2011 में छह चरण
  • 2016 में सात चरण
  • 2021 में आठ चरण

पिछले तीन लोकसभा चुनावों में भी पश्चिम बंगाल में वोटिंग कई चरणों में हुई है।

  • 2014 में पांच चरण
  • 2019 में सात चरण
  • 2024 में भी सात चरण

 

चुनाव आयोग पर लगे आरोपों पर सफाई
एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर लगे आरोपों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 326 चुनाव आयोग को यह संवैधानिक दायित्व देता है कि वह सिर्फ पात्र लोगों को ही मतदाता सूची में रखे। चुनाव आयोग यह जिम्मेदारी एसआईआर के जरिए निभाता आया है। जहां तक राजनीतिक व्यक्तियों या राजनीतिक दलों की ओर से दिए गए राजनीतिक बयानों की बात है, आयोग इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। चुनाव से पहले दिए गए वक्तव्यों या फैसलों पर चुनाव आयोग का टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा।

आचार संहिता से ठीक पहले हुई घोषणाओं पर जवाब
उन्होंने कहा कि जहां तक कुछ राज्यों द्वारा आचार संहिता के लागू होने के ठीक पहले घोषणाएं करने की बात है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकारें आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले कोई भी नीति या निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, आचार संहिता लागू होने के बाद इसकी इजाजत नहीं है और पांच राज्यों में यह आचार संहिता अभी से लागू हो गई है।

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चुनावी हिंसा पर मुख्य चुनाव आयुक्त की दो टूक
उन्होंने कहा कि राजनीतिक हिंसा और चुनाव को प्रभावित करने वाले किसी भी कदम को चुनाव आयोग बर्दाश्त नहीं करेगा और ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। जहां तक गलत जानकारी फैलाने या डीप फेक की बात है, हमारे नोडल ऑफिसर इसकी निगरानी करेंगे और उचित लगने पर एफआईआर की व्यवस्था करेंगे।

खुद को हटाए जाने वाले प्रस्ताव के सवाल का सीईसी ने नहीं दिया जवाब 
इस दौरान जब मुख्य चुनाव आयुक्त से विपक्ष द्वारा संसद में उन्हें हटाने के लिए नोटिस देने पर सवाल किया गया, तो उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने इस सवाल ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया और सवालों को टाल दिया। दरअसल, विपक्षी दलों ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों में नोटिस देकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाने की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार कई मौकों पर केंद्र की सत्तारूढ़ भाजपा की मदद करते नजर आए हैं। खासतौर पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया केंद्र की भाजपा सरकार को फायदा पहुंचाने के लिए की गई।

किस आधार पर हटाए जा सकते हैं सीईसी?
भारतीय संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी कठिन होती है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके से हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि उन्हें केवल सिद्ध दुराचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। लेकिन इसे पास कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यानी सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है।

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