उत्तराखंड भू – कानून : राज्य के गठन होते ही शुरू हो गया था जमीनों का खेल, देखे हमारी रिपोर्ट

आज जिस भू-कानून को लागू करने की मजबूती से पैरवी की जा रही है, उसकी जरूरत तो दरअसल उत्तराखंड गठन के साथ ही शुरू हो गई थी। यहां की कीमती जमीनों को शुरुआती सरकारों के कार्यकाल में औने-पौने दामों में बेचा गया। बाहरी राज्यों के तमाम लोगों के लिए उत्तराखंड की जमीनें काला धन खपाने का जरिया बनती रहीं हैं। उत्तराखंड का गठन होने के बाद वर्ष 2000 से 2003 के बीच जमीनों की खरीद फरोख्त में किसी तरह की कोई रुकावट नहीं थी। वर्ष 2003 में सरकार एक अध्यादेश लाई थी, जिसके तहत उत्तराखंड के किसान ही निकायों के बाहर जमीन खरीद सकते थे।

हालांकि बाद में सरकार एक और अध्यादेश लाई, जिसे एक्ट का रूप दे दिया गया। इस एक्ट में यह साफ किया गया कि कौन जमीन खरीद सकता है और इसकी क्या सीमाएं होंगी।

एनडी तिवारी सरकार में औद्योगिक पैकेज मिला। जिसके बाद प्रदेश में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला। तमाम लोग उत्तराखंड में निवेश के बहाने जमीनें खरीदने लगे। इससे प्रदेश के लोगों की महंगी जमीनें देखते ही देखते दूसरे राज्यों के लोगों के हाथों में चली गई। यह सिलसिला करीब दस साल तक चला।

दूसरे राज्यों के लोगों के लिए उत्तराखंड की जमीनों में निवेश अपने काले धन को खपाने का भी एक बड़ा जरिया बनकर सामने आया। विशेषज्ञों की मानें तो तमाम ऐसे लोगों ने यहां जमीनें खरीदीं, जो कि केवल अपना काला धन यहां खपाने के लिए आए थे। लिहाजा, प्रदेश के गठन के साथ से ही चल रहा यह जमीनों का खेल आज भी जारी है।

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