उत्तराखंड में विभिन्न मामलों में अग्रिम जमानत दी जा सकती है या नहीं यह एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है। मामले में दो विभिन्न एकल पीठों के अलग मत होने के बाद इसे हाई कोर्ट की बड़ी बेंच की ओर से तय करने का प्रस्ताव किया गया है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 482 का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 438 के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य संशोधन पर प्रभावी होगा या नहीं और संहिता 2023 के अभियुक्तों के लिए लाभदायक व उदार प्रावधान इससे पूर्व के मामलों के संबंध में लागू होंगे या नहीं इस गंभीर और पेचीदा मामले में हाई कोर्ट की बड़ी बेंच से विचार का सुझाव रखा गया है।
इस संदर्भ में कोर्ट की एक अन्य बेंच के पूर्व के निर्णय से असहमत होते हुए जस्टिस आलोक वर्मा की एकलपीठ ने मामले में स्पष्टता के लिए रजिस्ट्री को निर्देश दिए कि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करे जिससे इसे बड़ी बेंच को भेजा जा सके। मामले के अनुसार अपनी गिरफ्तारी की आशंका से हरीश कुमार प्रजापति ने आईपीसी की धारा 302 के तहत 2021 में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, देहरादून में दर्ज एफआईआर पर, विजयपाल ने 2023 में चंबा, जिला टिहरी गढ़वाल में धारा 376(3), धारा 506 आईपीसी पॉक्सो के तहत दर्ज एफआईआर में, कीर्ति बल्लभ नैनवाल और दो अन्य ने 2023 में एंटी करप्शन ब्रांच, देहरादून में धारा 302 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत दर्ज एफआईआर में, रामनरेश त्यागी और अवनीत त्यागी ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट 1986 के तहत 2022 में प्रेम नगर, देहरादून में पंजीकृत केस में, समीर चौधरी ने 2022 में एनडीपीसी एक्ट, 1985 के तहत दर्ज मामले में, अंजलि शर्मा ने 2025 में उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के तहत रायपुर, देहरादून में पंजीकृत मामले में और अनामिका मैठाणी ने 2025 में उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कोटद्वार में पंजीकृत एफआईआर में धारा 482 के अंतर्गत अग्रिम जमानत जे लिए आवेदन किया था।
सुनवाई के दौरान सीबीआई के अधिवक्ता ने लालकुआं दुग्ध संघ अध्यक्ष मुकेश सिंह बोरा बनाम उत्तराखंड राज्य में इस न्यायालय की समन्वय पीठ के सितंबर 2024 के आदेश का हवाला देते हुए इन आवेदनों पर आपत्ति की थी। उन्होंने कहा कि अग्रिम जमानत आवेदन उत्तराखंड राज्य द्वारा संशोधित दंड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 438 और 2023 की धारा 531 के क्रम में स्वीकृति के योग्य नहीं हैं। उक्त मामले में राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उत्तराखंड राज्य की अधिसूचना 11 अगस्त 2020 से संहिता की धारा 438 को लागू किया गया था। इसमें कहा गया है कि अधिनियम के तहत विभिन्न अपराधों पर अग्रिम जमानत का प्रावधान लागू नहीं होगा। इसके अनुसार शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923, उत्तराखंड में लागू उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट 1986, अनुकूलन और संशोधन आदेश, 2002, आईपीसी की धारा 376 की विभिन्न उपधाराएं, राज्य के विरुद्ध अपराध, पॉक्सो एक्ट, 2012, ऐसे अपराध जिनमें मृत्युदंड दिया जा सकता के तहत किसी व्यक्ति ने उच्च न्यायालय में आवेदन किया है तो उस व्यक्ति की ओर से किया गया कोई आवेदन सत्र न्यायालय द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दोनों पक्ष सुनने के बाद न्यायामूर्ति ने कहा कि इस न्यायालय की राय है कि अभियुक्त 2023 की संहिता में दिए गए अधिक उदार प्रावधानों का लाभ पाने का हकदार है इसलिए वे समन्वय पीठ के दृष्टिकोण से असहमत होते हुए प्रश्न पर सम्यक विचार के लिए मामले को एक बड़ी पीठ को प्रेषित कर रहे हैं।
ये तर्क दिए याचिका कर्ताओं ने
अग्रिम जमानत की मांग करते हुए आवेदकों की ओर से तर्क दिया गया कि अग्रिम जमानत एक प्रक्रिया नहीं बल्कि मौलिक अधिकार है। 2023 की संहिता में आईपीसी की धारा और अन्य अधिनियमों के तहत अपराधों के लिए अग्रिम जमानत को प्रतिबंधित करने पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है भले ही वे संहिता 2023 के प्रभावी होने से पहले के मामले हों। संहिता 2023 को ऐसे तरीके से पढ़ा जाना चाहिए जो अभियुक्त के अधिकारों को प्रतिबंधित करने के बजाय संरक्षित करे। समान प्रकृति के उन्होंने कहा कि 2025 में रमन साहनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि संहिता, 2023 की धारा 482 के प्रावधान राज्य पर प्रबल होंगे। अग्रिम जमानत का प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में निहित है। यह झूठे आरोप या कानून के दुरुपयोग के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक पूर्व-निवारक उपाय है। अग्रिम जमानत मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ एक सुरक्षा है। स्वतंत्रता एक सभ्य अस्तित्व का सार है। संहिता, 2023 भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के महत्व को कायम रखती है। संहिता, 2023 के अधिनियमित होने के बाद उत्तराखंड राज्य द्वारा संहिता, 2023 की धारा 482 में कोई संशोधन नहीं लाया गया है। इस आधार पर ये अग्रिम जमानत याचिकाएं विचारणीय हैं।







