कार्तिक पूर्णिमा का प्रभात अयोध्या में आस्था की स्वर्ण रेखा बनकर उदित हुआ। भोर की पहली किरण सरयू के जल पर झिलमिलाई तो घाटों पर उमड़ पड़ा श्रद्धा का सागर। “जय श्रीराम” के गगनभेदी जयघोषों के बीच करीब 15 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र सरयू में डुबकी लगाई और पूजन-अर्चन के बाद गोदान की परंपरा का निर्वहन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। मानो पूरी रामनगरी आस्था की अलौकिक ध्वनि से अनुप्राणित हो उठी हो।
कार्तिक पूर्णिमा व परिक्रमा मेले के अंतिम स्नान पर्व पर बुधवार को रामनगरी आस्था के शिखर को स्पर्श करती नजर आई। लाखों श्रद्धालुओं ने सरयू में डुबकी लगाई। यह सिलसिला भोर से ही शुरू हुआ तो पौ फटने के साथ और प्रगाढ़ होता गया। सरयू के स्नान घाट से प्रमुख मंदिरों की ओर जाने वाले मार्ग श्रद्धालुओं से पटे रहे। दोपहर बाद मेलार्थियों की भीड़ मेला क्षेत्र से अपने घरों को लौटने लगी। श्रद्धालु स्नान के बाद दान-पुण्य के कर्म में लीन रहे। कहीं तुलसीदास की चौपाइयों की गूंज थी, तो कहीं रामचरितमानस का पाठ।

मठ-मंदिरों में दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ ने अयोध्या की गलियों को आस्था के रंगों से रंग दिया। हनुमानगढ़ी, कनक भवन, राम मंदिर हर ओर भक्तों की लंबी कतारें दिनभर लगी रहीं। रामधुन में डूबे श्रद्धालु मानो सांसारिक चिंता से मुक्त होकर लोक और परलोक के संगम का अनुभव कर रहे हों। सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही, प्रशासन ने पूरे दिन श्रद्धालुओं के प्रवाह को सहज बनाए रखा। आला अधिकारी मेला क्षेत्र में भ्रमणशील रहे। ड्रोन कैमरों से निगरानी, स्वयंसेवकों की सतत सेवा और संतों के प्रवचनों ने पूरे आयोजन को भक्ति और अनुशासन का अनूठा संगम बना दिया।
सुबह तीन बजे ही घाटों पर जुट गए श्रद्धालु
30 अक्तूबर को 14 कोसी परिक्रमा के की साथ आरंभ हुए कार्तिक पूर्णिमा मेले के अंतिम पर्व पर स्नान-दान व दर्शन-पूजन के लिए पूर्व संध्या से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी। पूर्णिमा स्नान को तड़के तीन बजे से ही श्रद्धालुओं का रेला सरयू के घाटों पर जुटने लगा। सरयू के समानांतर ही सरयू के घाटों पर आस्था की धारा प्रवाहित होती दिखी। कोहरे में अल सुबह सूर्यदेव भले ही देर से चमके, उनसे पहले आस्था का सूर्य जरूर चमक रहा था। सुबह की ठंडक भी श्रद्धालुओं की आस्था को नहीं डिगा पाई।








