बिहार सीएम शपथ- इन 11 जिलों से मंत्री देना NDA की होगी मजबूरी, बदलाव कहां होगा? बिहार चुनाव परिणाम का उपहार कुछ ऐसा

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जितना बड़ा उपहार दिया है, उस हिसाब से मुख्यमंत्री के अलावा 36 मंत्रियों से काम चलाना बहुत मुश्किल है। इसलिए, बिहार विधानसभा में इस बार सबसे बड़े दल भारतीय जनता पार्टी में सर्वाधिक माथापच्ची हुई। एनडीए विधायक दल का नेता नीतीश कुमार को चुनने की औपचारिकता गृह मंत्री अमित शाह के आने से पहले हो गई। इसके बाद मंत्रियों की सूची को फाइनल करते हुए पर्सनल कॉल जाना शुरू हुआ। देर रात तक किसी को सामने वाले का नाम नहीं पता चला। अपना नाम कोई बताने को तैयार नहीं। ऐसे में गुरुवार सुबह शपथ ग्रहण के लिए तैयार होकर राजभवन जाने वाली सूची के आने से पहले जानिए कि एनडीए, खासकर भाजपा के लिए मजबूरी भी कितनी है?

 

भाजपा की सूची में बड़ा बदलाव तय, जदयू ज्यादातर दुहराएगी
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड ने टिकट देते समय भी चेहरों को बदलने पर फोकस नहीं किया था। दूसरी तरफ भाजपा ने मंत्री समेत सीटिंग विधायकों का टिकट काटने में कोताही नहीं बरती। कहा जा रहा था कि उसका नुकसान होगा, लेकिन इस बार सारी बातें हवा में रह गईं। लेकिन, अब जो परिणाम आया है- उसे हवा में फेंकना भाजपा के लिए भी आसान नहीं। जिन इलाकों-जिलों ने खुद को अब तक भाजपा-मुक्त रखा था; वहां भी इस बार मतदाताओं ने एनडीए पर भरोसा जताया है।

परेशानी यह है कि बिहार विधानसभा में 243 सीटों 15 प्रतिशत के हिसाब से 36.45, यानी 36 मंत्री हो सकते हैं। बनाने के लिए लालू-राबड़ी सरकार में जंबो मंत्रिमंडल भी रहा है, लेकिन नियम 36 पर रोकता है। पिछली सरकार में मुख्यमंत्री समेत 7 विधान पार्षद के साथ 29 विधायक मंत्री थे। इस बार दो विधान पार्षद सम्राट चौधरी और मंगल पांडेय विधायक बन चुके हैं। सीएम तो विधान परिषद् सदस्य हैं ही। ऐसे में 36 में से 35 मंत्रियों को चुनते समय जब जदयू अपने ज्यादातर चेहरों को दुहराने की ओर है तो भाजपा में नए चेहरों को मौका देने की तैयारी है। इन चेहरों में पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव बड़ा नाम हैं। साथ ही, लोजपा, रालोमो से तो नया चेहरा आना ही है। हम-से से विधान परिषद् सदस्य संतोष कुमार सुमन ही फिर मंत्री बनेंगे।

भाजपा की जिम्मेदारी बढ़ी, सभी से समन्वय का बिंदु भी वही
भाजपा के लिए मंत्रियों की सूची बनाना इसलिए भी टेढ़ी खीर रहा, क्योंकि सबसे बड़े दल के साथ इस बार उसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी है। इस बार के चुनाव में एनडीए के अंदर जदयू अलग कोटे में था, जबकि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा भाजपा के कोटे में थे। ‘अमर उजाला’ ने चुनावों के लिए सीट बंटवारे से काफी पहले यह बताया था कि इसी फॉर्मूले के तहत चुनाव में उतरेंगे एनडीए के दल। अब मंत्रिपरिषद् के गठन में भी यह फंडा है। इसी कारण जदयू की अलग बैठक चर्चा में रही और भाजपा की अलग। बाकी तीनों दलों ने भाजपा के साथ समन्वय किया है, क्योंकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में दो दलों के प्रमुख- चिराग पासवान और जीतन राम मांझी मंत्री हैं, जबकि तीसरे दल के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा उसी कतार में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

जहां मंत्री देना जरूरी दिख रहा अब, वह जिले देखें
सारण की 10 में से 03 सीटें एनडीए के पास थीं। अमनौर के भाजपा विधायक कृष्ण कुमार मंटू मंत्री थे। इस बार 07 सीटें एनडीए के पास आई हैं। वैशाली की 08 में से 04 सीटें एनडीए के पास थीं। एक भी मंत्री नहीं थे। इस बार 07 सीटें एनडीए के खाते में आई हैं। खगड़िया की 04 में से 02 सीटें एनडीए के पास थीं। कोई मंत्री नहीं थे। इस बार सभी 04 विधायक एनडीए के खाते में हैं। भागलपुर की 07 में से 05 सीटें एनडीए के पास थीं। कोई मंत्री नहीं थे। इस बार सभी 07 विधायक एनडीए के खाते में हैं। भोजपुर की 07 में से 03 सीटें एनडीए के पास थीं। कोई मंत्री नहीं थे। इस बार सभी 07 सीटें एनडीए के पास आई हैं। बक्सर की 04 में से एक भी सीट एनडीए के पास नहीं थी। कोई मंत्री नहीं थे। इस बार 03 सीटें एनडीए के पास आई हैं।

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रोहतास की 07 में से एक भी सीट एनडीए ने नहीं जीती थी। बाद में कांग्रेस के मुरारी प्रसाद गौतम सत्ता के समर्थन में आ गए। इस बार वह लोजपा-R से विधाकय बने। उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता भी यहीं से विधायक बनीं। इस बार 06 सीटें एनडीए के खाते में आईं। औरंगाबाद की 06 में से एक भी सीट एनडीए ने नहीं जीती थी। इस बार 05 सीटें एनडीए के खाते में आई हैं। नवादा की 05 में से 01 सीट एनडीए के खाते में थीं। चुनाव से पहले राजद के दो विधायक एनडीए के साथ दिखे। एक को जदयू ने उतारा भी। वह जीत गईं। इस बार नवादा की 04 सीटें एनडीए के खाते में आई हैं। कटिहार की 07 में से 04 सीटें एनडीए के पास थीं। यहां से उप मुख्यमंत्री तार किशोर यादव पहले रहे थे, लेकिन दूसरी बार बनी सरकार में उन्हें जगह नहीं मिली थी। इस बार, एनडीए के पास यहां 06 विधायक हैं। मधेपुरा की 04 में से 02 सीटें एनडीए के पास थीं। यहां से कोई मंत्री नहीं थे। इस बार 03 सीटें एनडीए के खाते में आई हैं।

जिन जिलों को मंत्री मिलने की उम्मीद नहीं, हालांकि…
शिवहर की एकलौती सीट भी एनडीए के खाते में नहीं थी। बाद में तत्कालीन राजद राजद विधायक पिछले साल बहुमत परीक्षण के दौरान सत्ता के साथ आए थे। मंत्री नहीं थे। इस बार यह इकलौती सीट एनडीए के खाते में है। किशनगंज की 04 में से कोई भी सीट एनडीए के खाते में नहीं थी। इस बार 01 सीट जीती है। ठाकुरगंज से जदयू विधायक बने हैं गोपाल अग्रवाल। अरवल की 02 में से एक भी सीट एनडीए ने नहीं जीती थी। इस बार सभी 02 सीटें एनडीए के खाते में हैं। जहानाबाद की 03 में से एक भी सीट एनडीए ने नहीं जीती थी। इस बार 01 सीट एनडीए के खाते में आई है। इन जिलों से मंत्री बनाया जाना फिलहाल चौंकाने वाली बड़ी बात है।

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एमएलसी वाली पहचान के कारण कोटा बढ़ना मुश्किल
बिहार के तीन जिले ऐसे हैं, जिनका कोटा मिला-जुला रह जाएगा। मुंगेर की 03 में से 02 सीटें एनडीए के पास थीं। सरकार गठन के समय तारापुर विधायक मेवालाल चौधरी को शपथ दिलाई गई, लेकिन भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड पर उन्हें तुरंत हटाया गया। इस बार विधान पार्षद और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी तारापुर से भाजपा विधायक बने हैं। इस बार सभी 03 सीटें एनडीए के खाते में हैं। इसी तरह, सीवान की 8 में से 02 सीटें एनडीए के पास थीं। कोई मंत्री नहीं थे। इस बार 07 सीटें एनडीए के पास आई हैं। मंत्री मंगल पांडेय यहां से जीतकर विधानसभा में आए हैं। वह विधान पार्षद थे। बढ़ी संख्या के हिसाब से कोटा बढ़ाया जा सकता है, लेकिन मंगल पांडेय को इस जिले का हिस्सा मानते हुए संख्या बढ़ाए बगैर काम चलाया भी जा सकता है। शेखपुरा की 02 में से 01 सीट एनडीए के पास थीं। कोई विधायक मंत्री नहीं थे। इस बार सभी 02 सीटें एनडीए के खाते में हैं। अगर शेखपुरा की पहचान रहे अशोक चौधरी को मंत्रिपरिषद् में विधान पार्षद कोटे से लाया जाता है तो शेखपुरा का कोटा अपने आप पूरा मान लिया जाएगा।


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