Kargil Vijay Diwas : कुछ पल और ठहर जाती मौत तो कराची में भी तिरंगा लहरा कर ही आते,जब थर्रा उठा था पाकिस्तान

Spread the love

कारगिल युद्ध को हुए 23 साल पूरे हो गए हैं। भारत के जांबाजों की वीरता की दास्तां आज भी हमारे जेहन में ताजा है। इस युद्ध में भारत माता के वीर सपूत मेजर विक्रम बत्रा ने अद्वितीय शौर्य और रणकौशल का परिचय दिया था। उनके दोस्त और दुश्मन उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से पुकारते थे। बत्रा ने न केवल सामरिक रुप से महत्वपूर्ण कई चोटियों पर कब्जा किया बल्कि पाक सेना के मनोबल को भी कुचलकर रख दिया।
बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से प्वाइंट-5140 छीन लिया था। कारगिल युद्ध के दौरान लड़ाई की भीषणता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाक सेना पहाड़ों के ऊपर बने बंकरों में छिपी थी जबकि भारतीय सेना नीचे खुली जगह से हमला कर रही थी। इसी कारण भारत को पाक सेना के मजबूत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
विज्ञान में स्नातक विक्रम बत्रा की सेना में ज्वॉइनिंग सीडीएस के जरिए सेना में हुई थी। जुलाई 1996 में उन्हें भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रवेश मिला और 6 दिसंबर 1997 को 13 सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर उन्हें नियुक्ति मिली। जिसके बाद उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग भी ली।

विक्रम बत्रा की कमांडो टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब को जीतने के बाद उन्हें पदोन्नति देकर कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सामरिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण चोटी संख्या-5140 को पाक सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को मिली।

और पढ़े  ट्रंप का दावा: अमेरिका ने जब्त किया ईरानी मालवाहक जहाज, होर्मुज के पास घेराबंदी तोड़ने की कर रहा था कोशिश

बेहद दुर्गम क्षेत्र और प्रतिकूल परिस्थिति होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद विक्रम बत्रा ने इस चोटी से रेडियो के जरिए अपने कमांड को विजय उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ कहा। चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम की फोटो पूरी दुनिया ने देखी जो कारगिल युद्ध की पहचान बनी। उनका ये उद्घोष केवल सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में लोगों के दिलों में आज भी ताजा है। इसी दौरान विक्रम बत्रा को ‘शेरशाह’ के साथ ही ‘कारगिल का शेर’ का नाम मिला।
इसके बाद सेना ने विक्रम बत्रा और उनकी टीम को चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने की जिम्मेदारी सौंपी। जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैय्यर और अपने साथियों के साथ कैप्टन बत्रा इस चोटी को जीतने में लग गए। यह चोटी समुद्र तल से 17 हजार फीट की ऊंचाई पर थी और 80 डिग्री की चढ़ाई पर पड़ती थी।
7 जुलाई 1999 को एक जख्मी ऑफिसर को बचाते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो गए। उनके अद्मय शौर्य और पराक्रम को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अगस्त 1999 को सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।


Spread the love
  • Related Posts

    मन की बात- कलपक्कम रिएक्टर, भारत के परमाणु ऊर्जा सफर में मील का पत्थर, मन की बात में बोले PM मोदी

    Spread the love

    Spread the loveप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 133वें एपिसोड में देश की वैज्ञानिक ताकत और अंतरिक्ष उपलब्धियों पर जोरदार संदेश दिया। चुनावी हलचल के बीच भी उन्होंने जनता की…


    Spread the love

    हिल्टन होटल में 45 साल बाद फिर चलीं गोलियां,पहले रोनाल्ड, अब डोनाल्ड पर हमला

    Spread the love

    Spread the loveअमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन का मशहूर वॉशिंगटन हिल्टन होटल एक बार फिर अचानक सुर्खियों और दहशत के बीच आ गया है। यह वही जगह है, जिसने 45 साल…


    Spread the love

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *