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यूपी के वाराणसी में अपना घर आश्रम में रहने वाले 55 बुजुर्गों की पिछले एक साल में मौत हुई है। जब ये जिंदा थे, तब इनके अपनों ने इनकी कभी सुध नहीं ली। खैरियत नहीं पूछी। मौत हो गई तो सिर्फ इसलिए शव लेने आए क्योंकि उसके बिना बीमा क्लेम या संपत्ति पर हक नहीं मिल पाएगा।
इनमें से कुछ तो शव लेने भी नहीं आए, अंतिम संस्कार हो जाने के बाद सिर्फ मृत्यु प्रमाणपत्र चाहते हैं। परंपरा है कि जिन अपनों की मौत हो जाती है, उन्हें पितृपक्ष में याद किया जाता है। कुछ लोग जिंदा रहते ही अपने माता-पिता को आश्रम में रहने के लिए छोड़ आते हैं।
अपना घर आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन कहते हैं, अपनों का शव ले जाने के पीछे का असली मकसद संपत्ति का बंटवारा, जमीन की रजिस्ट्री या फिर बीमा क्लेम होता है। जो लोग जीते जी अपनों को देखने तक नहीं आते वे मृत्यु के बाद शव लेने पहुंच जाते हैं।
50 लाख का बीमा, मरने के अगले दिन बेटा ले गया शव
देवरिया के 60 वर्षीय बुजुर्ग जमींदार परिवार से थे। उन्होंने अपने नाम से 50 लाख रुपये का बीमा करा रखा था। तीन साल से आश्रम में रह रहे थे। बीच में तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भर्ती भी कराया गया था। बीमारी की सूचना देने के बाद भी बेटा नहीं आया। लेकिन मौत के अगले दिन ही आकर शव ले गया।