सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को टिप्पणी की कि अदालतों में मामलों की वर्चुअल सुनवाई के मामले में बार एसोसिएशन के सदस्य एकमत नहीं हैं और जब मामलों की भौतिक सुनवाई को शुरू करने की बात आती है तो वकीलों के बीच मतभेद होता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की खंडपीठ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि कुछ अधिवक्ता चाहते हैं कि अदालतें भौतिक सुनवाई करें जबकि कुछ अन्य ऐसा नहीं चाहते, हम इस पर विचार करेंगे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता, ऑल इंडिया ज्यूरिस्ट्स एसोसिएशन के वकील सिद्धार्थ आर गुप्ता ने कहा कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वर्चुअल सुनवाई को पूरी तरह से रोकने का निर्देश दिया है, जिससे वादियों और अधिवक्ताओं को असुविधा हो रही है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की ई-समिति के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने भी पूरे देश के उच्च न्यायालयों से सुनवाई के हाइब्रिड मोड (वर्चुअल तथा भौतिक) को अपनाए रखने का अनुरोध किया था। याची ने कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालय एक के बाद एक आभासी सुनवाई बंद कर रहे हैं जिनमें उत्तराखंड व गुजरात शामिल हैं। याची ने सुनवाई के हाइब्रिड मॉडल को जारी रखने की मांग की।
कोरोना के मामलों में कमी के बाद, विभिन्न उच्च न्यायालय मामलों की भौतिक सुनवाई फिर से शुरू कर रहे हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 16 अगस्त को एक अधिसूचना जारी कर कहा था कि सभी वकीलों को 24 अगस्त से भौतिक रूप से उपस्थित होना होगा। हाईकोर्ट के इस निर्देश को चुनौती देने के अलावा ऑल इंडिया ज्यूरिस्ट्स एसोसिएशन की याचिका में यह भी मांग की गई थी कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से वर्चुअल सुनवाई को अनुच्छेद 19 (1) (ए) और (जी) के तहत एक मौलिक अधिकार मानते हुए सभी उच्च न्यायालयों को भौतिक सुनवाई के विकल्प के रूप में आभासी मोड से सुनवाई से इंकार करने से रोकने के लिए निर्देश दिए जाएं।









